भक्ति क्या है, जानिए

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संक्षेप में, को अपने इष्टदेव में अपने मन को लगाने के साथ-साथ तन-मन की पवित्रता, स्थिरता, सौम्यता, सहजता और उदारता विकसित करने का प्रयत्न करना चाहिए। इस अध्याय के सूत्र श्लोक हैं-
 
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च।
निर्ममो निरहंकार: समदु:खसुख: क्षमी।।13।।
 
सन्तुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चय:।
मय्यर्पित मनोबुद्धिर्यो मभ्दक्त: स मे प्रिय: ।।14।। 

भावार्थ :
'जो पुरुष सब प्राणियों में द्वेषभाव से रहित, स्वार्थरहित होकर सबको प्रेम करने वाला तथा सब पर समान रूप से दयाभाव रखता है, ममता और अहंकार से दूर है, दु:ख-सुख की प्राप्ति में सम व क्षमावान है तथा जो योगी निरंतर संतुष्ट मन:स्‍थिति में रहता है, मन व इन्द्रियों को अनुशासित रखता है तथा मुझमें दृढ़ श्रद्धा के साथ निरंतर मन लगाए रखता है, ऐसा मेरा भक्त मुझे बहुत प्रिय है।'
स्पष्ट है कि भक्त होने का मनोभाव रखने वाला व्यक्ति यदि उपरोक्त भाव धारा को ग्रहण करता है तो ही उसकी भक्ति सार्थक है, शांतिदायिनी और सामाजिक दृष्टि से भी कल्याणकारी है।



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