7 बड़े धर्मान्तरण और भारत बन गया बहुधर्मी देश

जैन धर्म : ब्राह्मण और श्रमण। भारतभूमि पर ये दो धाराएं शुरुआत से ही प्रचलन में रहीं। कहीं-कहीं इनका संगम हुआ तो कहीं-कहीं ये एक-दूसरे से बहुत दूर चली गईं, लेकिन दोनों का लक्ष्य एक ही रहा और वह है- मोक्ष। एक विचारधारा ईश्वर को मानती हैं तो दूसरी के लिए आत्मा ही सत्य है।
जो एकेश्‍वरवादी हैं उनको वैदिक विचारधारा का माना जाता था और जो अनीश्‍वरवादी थे उनको अवैदिक विचारधारा का माना जाता था। भारत में मत भिन्नता की शुरुआत इसी तरह हुई। यही दो विचारधाराएं भारत से बाहर गईं और बदले हुए रूप में फिर से भारत में प्रवेश कर गईं। पहले इन विचारधाराओं की कोई व्यवस्था नहीं थी, क्योंकि सभी को स्वतंत्रता थी कि कोई किसी भी मार्ग से जाकर मोक्ष प्राप्त कर ले।> > अरिष्टनेमि और कृष्ण के काल तक तो यह परंपरा इस तरह साथ-साथ चली कि इनके फर्क को समझना आमजन के लिए कठिन ही था लेकिन बस यहीं से धर्म के व्य‍वस्थीकरण की शुरुआत हुई तो फिर सब कुछ अलग-अलग होता गया। जैन परंपरा को पहले विदेहियों की परंपरा कहा जाता था। राजा जनक इसी परंपरा के अनुयायी थे। अष्टावक्र भी उसी परंपरा के अनुयायी थे। इसी परंपरा से चार्वाकवादी विचारधारा का जन्म हुआ, लेकिन यह विचारधारा भारत में पनप नहीं पाई। भारत में अधिकतर दार्शनिक नास्तिक विचारधारा के ही पोषक रहे हैं।
भारत उक्त दो तरह की विचारधाराओं में आदिकाल से ही बंटा हुआ था, लेकिन वैदिक विचारधारा ही भारत में प्रधान रूप से हावी रही। गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र ने ही मिलकर भारत में वैदिक धर्म को एक व्यवस्था दी। हालांकि इन दोनों की लड़ाई के चलते भारत में मत भिन्नता का जन्म भी हुआ। बाद में भगवान कृष्ण के काल में धर्म को फिर से व्यवस्थित किया गया। इसके चलते जैन धर्म लगभग लुप्त होने के कगार पर हो चला था। तब शुरू हुआ धर्म प्रचार या कहें कि धर्मान्तरण...

पार्श्वनाथ जैनों के 23वें तीर्थंकर थे। इनका जन्म अरिष्टनेमि के 1,000 वर्ष बाद इक्ष्वाकु वंश में पौष माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को विशाखा नक्षत्र में वाराणसी में हुआ था। इन्होंने ही जिन परंपरा को सर्वप्रथम एक व्यवस्‍था देकर इसका प्रचार-प्रसार किया। माना जाता है कि जिन परंपरा का यह पहला ऐसा संप्रदाय था जिसने जिन परंपरा को एक संप्रदाय में ढाला और इस विचारधारा के मानने वालों को एक ही छत के नीचे ला खड़ा किया।

भगवान पार्श्वनाथ तक यह परंपरा कभी संगठित रूप में अस्तित्व में नहीं आई। पार्श्वनाथ से पार्श्वनाथ संप्रदाय की शुरुआत हुई और इस परंपरा को एक संगठित रूप मिला। यहीं से जैन धर्म ने अपना अलग अस्तित्व गढ़ना शुरू कर दिया था। लेकिन इसको मजबूत आधार मिला 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के काल में।

ईसा पूर्व छठी शताब्‍दी में भगवान महावीर ने जैन धर्म का प्रचार किया जिसके कारण बहुत से क्षत्रिय और ब्राह्मण जैन होते गए। चाणक्य का नाम कौन नहीं जानता। माना जाता है कि वे खुद जैन धर्म से प्रभावित होकर जैन हो गए थे। भगवान महावीर ने तप, संयम और अहिंसा का संदेश दिया था। इस काल तक का मतलब स्वेच्छा से धर्म का मार्ग चुनना था न कि किसी संप्रदाय की जन शक्ति को बढ़ाना।

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