आश्रम घर की जगह नहीं ले सकते
विश्व वृद्ध दिवस पर विशेष
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NDइसमें एक तरफ वृद्धाश्रम में रह रहे "सीनियर सिटीजन" हैं तो दूसरी तरफ वे बुजुर्ग हैं, जिनकी उम्र भले ही 60 पार हो गई है लेकिन उनकी सोच आज भी जवाँ है। उनके चेहरे पर भले ही झुर्रियाँ आ गई हैं लेकिन दिनचर्या और काम का जज्बा किसी युवा से कम नहीं है।
आश्रम में रहना है मजबूरी :
वृद्धाश्रम में रहने वाले दंपति भास्करराव व सुमन पाटिल बताते हैं कि बेटा हमें अपने साथ रखना तो चाहता है, लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति सृद़ढ़ नहीं होने से हमें मजबूरी में यहाँ रहना प़ड़ रहा है।
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ND70 वर्षीय किराना व्यवसायी मोतीलाल टटवा़ड़े बताते हैं कि उम्र के इस प़ड़ाव पर आकर बु़ढ़ापे को अपने पर हावी नहीं होने देना व्यक्ति की सोच और जीवनशैली पर निर्भर करता है।
उन्होंने कहा कि मैं पिछले 35 वर्षों से रोजाना सुबह की सैर के बाद अपनी दुकान पर पहुँच कर सारे कामकाज संभा ल रहा हूँ। आज भी यह सिलसिला जारी है। बेशक मेरा बेटा दुकान ठीक प्रकार से संभाल लेता है, लेकिन रोजाना दुकान पर बैठना मुझे अच्छा लगता है।
बढ़ती उम्र में नहीं बदली दिनचर्या :
बुर्जुग छोटेलाल वर्मा कहते हैं कि उम्र के अनुसार शरीर अप ने आप ढल जाता है। इस उम्र में मेरी बोलने और सुनने की क्षमता में जरूर कमी आई है, लेकिन उम्र का असर मेरी कार्यक्षमता पर नहीं पड़ा।
मैं पिछले 40 वर्षों से टेन्ट हाउस संचालित कर रहा हूँ। आज भी मेरी दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आया है। आज 73 वर्ष की उम्र में भी मैं बिजनेस संबंधी कार्य पहले की तरह उसी जोश और गति से करता हूँ।
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NDवृद्धाश्रम में रहने वाले सेवानिवृत्त प्राचार्य देवकीनंदन गुप्ता बताते हैं कि दो बेटे होने के बावजूद मुझे वृद्धाश्रम में रहना प़ड़ रहा है। इसके लिए बच्चे नहीं बल्कि परिस्थितियाँ जिम्मेदार हैं।
इंदौर में अकेले रहने वाला बेटा बिजनेस टूर की व्यस्तता के कारण मुझे यहाँ छो़ड़ गया ताकि मैं अकेला नहीं रहूँ। उसके द्वारा मुझे यहाँ हरसंभव सुविधाएँ भी मुहैया कराई गई हैं, लेकिन फिर भी आश्रम, घर की जगह नहीं ले सकते।
