वक्त रहते अपनों की अहमियत समझें


अक्सर ऐसा होता है कि हम अपने दोस्तों, ऑफिस के लोगों, सहकर्मियों की तो बहुत इज्जत करते हैं और ये लोग यदि हमारी थोड़ी भी वक्त-बेवक्त मदद कर दें तो हम इनका एहसान चुकाने की कोशश करते हैं। लेकिन हम उन लोगों को कैसे भूल जाते हैं, जो हमारे जीवन का
अभिन्न हिस्सा होते हैं और जिनके सहयोग के बिना सुबह से रात तक के कोई भी काम हम अकेले नहीं कर सकते। वे लोग जो हमारे सबसे करीबी होते हैं। ये लोग हमारे इतने करीब होते हैं कि हम इन्हें देखना ही भूल जाते हैं। जी हां, यहां हम बात कर रहे हैं मां की...

देर रात को भी बिना किसी शिकायत के मेरी मनपसंद सब्जी के साथ मेरी राह देखती मां की सबसे ज्यादा कीमत मुझे अब समझ में आती है। वाकई कितना आसान था उस समय उसे यह कह देना कि- मैं तो बाहर से खाकर आया हूं। आज नौकरी के चलते पहली बार घर से दूर आया हूं। यहां अपने कपड़े खुद धो रहा हूं और रोज बाहर का कच्चा-पक्का खा रहा हूं, तब समझ में आ रहा है कि मां को वो इंतजार और उसके बाद मिलने वाला मेरा जवाब कितना चुभता होगा पर उसने कभी शिकायत नहीं की। इस बार सबसे पहले घर जाकर मां से अब तक के किए की माफी मांगूंगा।

ऐसा कहते हुए 26 वर्षीय रोहन की आंखें नम हो जाती हैं। घर से पढ़ाई के लिए निकले किसी युवक की ये भावनाएं बिलकुल भी नई नहीं हैं। असल में आपके अपने जो हमेशा आपके आस-पास सुविधा और सुरक्षा का घेरा बनाकर आपको कंफर्ट जोन में रखे रहते हैं, आप बड़ी आसानी से उनके प्रयासों को नजरअंदाज कर जाते हैं। यह सोचकर कि यह तो उनका कर्तव्य है। आपकी नजरों में उनकी अहमियत ही नहीं होती।

ऐसा ही एक और सामान्य उदाहरण उस पति का भी हो सकता है जिसकी पत्नी सालों से उसकी दिनचर्या के हिसाब से उसे भोजन पकाकर देने, ऑफिस के लिए अलमारी से कपड़ों के साथ-साथ मैचिंग रूमाल निकालकर रखने, हर महीने में दी गई धनराशि में घर खर्च चलाने, बच्चों को स्कूल लाने-छोड़ने से लेकर बिजली का बिल भरने तक का काम बिना किसी शिकायत के कर रही है और गाहे-बगाहे अचानक आ टपके उसके दोस्तों की मेहमाननवाजी भी वह थोड़ी चिढ़ या खीज के बाद कर देती है लेकिन पति को तब पत्नी की अहमियत समझ नहीं आती।

इस पर भी कभी-कभी 'सब्जी में नमक कम है' या 'शर्ट की बटन अब तक नहीं टांकी' जैसे जुमले बोलकर... दफ्तर का गुस्सा या अपनी खीज पतिदेव उस पर उतार डालते हैं। यह बात पति या पुत्र या किसी भी एक व्यक्ति की नहीं है...। इस उदाहरण में किसी स्त्री का भी नाम हो सकता है। मुख्य बात यह कि अपने किसी एक करीबी रिश्ते की अहमियत समझने और उसकी कद्र करने की हम कई बार जरूरत ही नहीं समझते। इसके उलट कई बार हम उस व्यक्ति को या उसके प्रयासों को नजरअंदाज करने के साथ ही उसके प्रति कठोर तथा नकारात्मक रुख भी अख्तियार कर लेते हैं।
श्रवण शक्ति कमजोर हो चुकने के बाद बुजुर्ग पिता का जोर से बोलना आपकी चिढ़ का कारण बन जाता है लेकिन उस समय आप ये भूल जाते हैं कि ये वही पिता हैं, जो बुखार आने पर रात-रातभर आपके सिरहाने बैठे रहे थे या आपके एक महंगे खिलौने की मांग पर जिन्होंने अपने वेतन से अग्रिम लिया था। या फिर किसी पार्टी में पत्नी की साधारण वेशभूषा आपके गुस्से का कारण बन जाती है जबकि पत्नी आपके द्वारा दी गई सीमित धनराशि में पूरे घर का खर्च चलाती है और पिछले कई सालों से बाकी खर्चों के चलते अपने लिए साड़ियां लाना टालती जा रही है।
क्या मतलब रहे अगर वक्त गुजर जाने के बाद आपको अपनों की कीमत समझ आए तो? इसलिए अपनों की इस अनमोल पूंजी को सहेजकर रखिए। वैसे भी आपके अपने आपसे सिर्फ प्रेम की आस रखते हैं और कुछ नहीं।



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