अब शांति वार्ता का क्या होगा

शशांक| ND| पुनः संशोधित मंगलवार, 19 अगस्त 2008 (14:38 IST)
परवेज मुशर्रफ के राष्ट्रपति पद से हटने की घटना को यदि हम भारत के नजरिए से देखें तो हमारे लिए सबसे अहम पहलू तो यही है कि मुशर्रफ के शासनकाल में भारत और पाक के बीच जो शांति वार्ता का दौर हुआ था, अब भविष्य में उसका क्या रूप होगा?

मुशर्रफ ने पूर्व में वाजपेयी सरकार और अब मनमोहन सरकार के कार्यकाल के दौरान दोनों देशों के बीच बातचीत का जो दौर जारी रखा, उसने कई मसलों पर दोनों देशों के बीच शांति प्रयासों को एक नई दिशा प्रदान की थी।

आगरा में शिखर वार्ता विफल होने के बाद 2004 में मुशर्रफ के कार्यकाल में पाक ने पहली बार माना कि भारत में आतंकी घटनाएँ करने वाले संगठनों को उनका मुल्क अपनी जमीन का उपयोग नहीं करने देगा।
पाकिस्तान की कथनी में बदलाव का यह अहम संकेत था लेकिन पिछले कुछ हफ्तों और महीनों में अचानक सीमापार से गोलीबारी शुरू हो गई और भारत में आतंकवादी घटनाएँ भी बढ़ गईं।

इन घटनाओं को हम यदि पाकिस्तान के ताजा घटनाक्रम से नहीं भी जोड़कर देखें तो इस तथ्य को नजरअंदाज भी नहीं कर सकते, इसलिए भारत के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण बात तो यही है कि आने वाले समय में पाकिस्तान का नया राजनीतिक नेतृत्व और आने वाले नए राष्ट्रपति भारत के प्रति कैसा रुख अपनाते हैं। आतंकवाद और घुसपैठ को पाकिस्तान की नई हुकूमत कैसे रोकती है।
हाल ही में अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास पर आतंकवादी हमले में जिस प्रकार से आईएसआई की भूमिका सामने आई है, वह इस बात का एक और प्रमाण है कि भारत के खिलाफ आतंकवादी वारदातों को बढ़ावा देने में पाकिस्तान की इस खुफिया एजेंसी की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भूमिका रही है।

अब मुशर्रफ के हटने के बाद आईएसआई पर किसका नियंत्रण रहता है, नई सरकार या फौज का। इसी प्रकार पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम किसके हिसाब से चलेगा। भारत के लिहाज से ये दोनों विषय महत्वपूर्ण हैं।(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं)



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