रविवार, 24 सितम्बर 2023
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आज है सीता जयंती : जन्म की कथा, स्तुति, स्तोत्र, चालीसा, आरती, मंत्र, महत्व एवं मुहूर्त

Janaki Jayanti 2022
 
प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन जानकी जयंती पर्व (Janaki Jayanti 2022) मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व गुरुवार, 24 फरवरी 2022 (Sita Ashtami 2022) को मनाया जा रहा है। यहां पढ़ें जानकी जयंती पर विशेष सामग्री- 
 
जन्म कथा- Sita Mata Birth Story 
 
माता सीता के जन्म से जुड़ी एक प्रचलित कथा के अनुसार कहा जाता है कि माता सीता लंकापति रावण और मंदोदरी की पुत्री थी। इस कथा के अनुसार सीता जी वेदवती नाम की एक स्त्री का पुनर्जन्म थी। वेदवती विष्णु जी की परमभक्त थी और वह उन्हें पति के रूप में पाना चाहती थी। इसलिए भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए वेदवती ने कठोर तपस्या की। 
 
कहा जाता है कि एक दिन रावण वहां से निकल रहा था जहां वेदवती तपस्या कर रही थी और वेदवती की सुंदरता को देखकर रावण उस पर मोहित हो गया। रावण ने वेदवती को अपने साथ चलने के लिए कहा लेकिन वेदवती ने साथ जाने से इंकार कर दिया। वेदवती के मना करने पर रावण को क्रोध आ गया और उसने वेदवती के साथ दुर्व्यवहार करना चाहा रावण के स्पर्श करते ही वेदवती ने खुद को भस्म कर लिया और रावण को श्राप दिया कि वह रावण की पुत्री के रूप में जन्म लेंगी और उसकी मृत्यु का कारण बनेंगी। 
 
कुछ समय बाद मंदोदरी ने एक कन्या को जन्म दिया। लेकिन वेदवती के श्राप से भयभीत रावण ने जन्म लेते ही उस कन्या को सागर में फेंक दिया। जिसके बाद सागर की देवी वरुणी ने उस कन्या को धरती की देवी पृथ्वी को सौंप दिया और पृथ्वी ने उस कन्या को राजा जनक और माता सुनैना को सौंप दिया। जिसके बाद राजा जनक ने सीता का पालन पोषण किया और उनका विवाह श्रीराम के साथ संपन्न कराया। फिर वनवास के दौरान रावण ने सीता का अपहरण किया जिसके कारण श्रीराम ने रावण का वध किया और इस तरह से सीता रावण के वध का कारण बनीं। 

Sita Janaki Stuti-श्री जानकी स्तुति  
 
जानकि त्वां नमस्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम्।
जानकि त्वां नमस्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम्।।1।।
 
दारिद्र्यरणसंहर्त्रीं भक्तानाभिष्टदायिनीम्।
विदेहराजतनयां राघवानन्दकारिणीम्।।2।।
 
भूमेर्दुहितरं विद्यां नमामि प्रकृतिं शिवाम्।
पौलस्त्यैश्वर्यसंहत्रीं भक्ताभीष्टां सरस्वतीम्।।3।।
 
पतिव्रताधुरीणां त्वां नमामि जनकात्मजाम्।
अनुग्रहपरामृद्धिमनघां हरिवल्लभाम्।।4।।
 
आत्मविद्यां त्रयीरूपामुमारूपां नमाम्यहम्।
प्रसादाभिमुखीं लक्ष्मीं क्षीराब्धितनयां शुभाम्।।5।।
 
नमामि चन्द्रभगिनीं सीतां सर्वाङ्गसुन्दरीम्।
नमामि धर्मनिलयां करुणां वेदमातरम्।।6।।
 
पद्मालयां पद्महस्तां विष्णुवक्ष:स्थलालयाम्।
नमामि चन्द्रनिलयां सीतां चन्द्रनिभाननाम्।।7।।
 
आह्लादरूपिणीं सिद्धिं शिवां शिवकरीं सतीम्।
नमामि विश्वजननीं रामचन्द्रेष्टवल्लभाम्।
सीतां सर्वानवद्याङ्गीं भजामि सततं हृदा।।8।।
जानकी चालीसा-Chalisa
 
।। दोहा।।
 
बन्दौ चरण सरोज निज जनक लली सुख धाम,
राम प्रिय किरपा करें सुमिरौं आठों धाम।।
 
कीरति गाथा जो पढ़ें सुधरैं सगरे काम,
मन मन्दिर बासा करें दुःख भंजन सिया राम।।
 
।। चौपाई।।
 
राम प्रिया रघुपति रघुराई, बैदेही की कीरत गाई।।
चरण कमल बन्दों सिर नाई, सिय सुरसरि सब पाप नसाई।।
जनक दुलारी राघव प्यारी, भरत लखन शत्रुहन वारी।।
दिव्या धरा सों उपजी सीता, मिथिलेश्वर भयो नेह अतीता।।
 
सिया रूप भायो मनवा अति, रच्यो स्वयंवर जनक महीपति।।
भारी शिव धनु खींचै जोई, सिय जयमाल साजिहैं सोई।।
भूपति नरपति रावण संगा, नाहिं करि सके शिव धनु भंगा।।
जनक निराश भए लखि कारन, जनम्यो नाहिं अवनिमोहि तारन।।
 
यह सुन विश्वामित्र मुस्काए, राम लखन मुनि सीस नवाए।।
आज्ञा पाई उठे रघुराई, इष्ट देव गुरु हियहिं मनाई।।
जनक सुता गौरी सिर नावा, राम रूप उनके हिय भावा।।
मारत पलक राम कर धनु लै, खंड खंड करि पटकिन भू पै।।
 
जय-जयकार हुई अति भारी, आनन्दित भए सबैं नर नारी।।
सिय चली जयमाल सम्हाले, मुदित होय ग्रीवा में डाले।।
मंगल बाज बजे चहुँ ओरा, परे राम संग सिया के फेरा।।
लौटी बारात अवधपुर आई, तीनों मातु करैं नोराई।।
 
कैकेई कनक भवन सिय दीन्हा, मातु सुमित्रा गोदहि लीन्हा।।
कौशल्या सूत भेंट दियो सिय, हरख अपार हुए सीता हिय।।
सब विधि बांटी बधाई, राजतिलक कई युक्ति सुनाई।।
मंद मती मंथरा अडाइन, राम न भरत राजपद पाइन।।
 
कैकेई कोप भवन मा गइली, वचन पति सों अपनेई गहिली।।
चौदह बरस कोप बनवासा, भरत राजपद देहि दिलासा।।
आज्ञा मानि चले रघुराई, संग जानकी लक्षमन भाई।।
सिय श्रीराम पथ पथ भटकैं, मृग मारीचि देखि मन अटकै।।
 
राम गए माया मृग मारन, रावण साधु बन्यो सिय कारन।।
भिक्षा कै मिस लै सिय भाग्यो, लंका जाई डरावन लाग्यो।।
राम वियोग सों सिय अकुलानी, रावण सों कही कर्कश बानी।।
हनुमान प्रभु लाए अंगूठी, सिय चूड़ामणि दिहिन अनूठी।।
 
अष्ठसिद्धि नवनिधि वर पावा, महावीर सिय शीश नवावा।।
सेतु बांधी प्रभु लंका जीती, भक्त विभीषण सों करि प्रीती।।
चढ़ि विमान सिय रघुपति आए, भरत भ्रात प्रभु चरण सुहाए।।
अवध नरेश पाई राघव से, सिय महारानी देखि हिय हुलसे।।
 
रजक बोल सुनी सिय बन भेजी, लखनलाल प्रभु बात सहेजी।।
बाल्मीक मुनि आश्रय दीन्यो, लवकुश जन्म वहां पै लीन्हो।।
विविध भांती गुण शिक्षा दीन्हीं, दोनुह रामचरित रट लीन्ही।।
लरिकल कै सुनि सुमधुर बानी, रामसिया सुत दुई पहिचानी।।
 
भूलमानि सिय वापस लाए, राम जानकी सबहि सुहाए।।
सती प्रमाणिकता केहि कारन, बसुंधरा सिय के हिय धारन।।
अवनि सुता अवनी मां सोई, राम जानकी यही विधि खोई।।
पतिव्रता मर्यादित माता, सीता सती नवावों माथा।।
 
।। दोहा।।
 
जनकसुता अवनिधिया राम प्रिया लवमात,
चरणकमल जेहि उन बसै सीता सुमिरै प्रात।।

मंत्र-Mantra 
 
- 'श्रीसीता-रामाय नम:' 
- श्रीरामचन्द्राय नम:।
- श्री रामाय नम:।
- श्री सीतायै नम:।
-'श्री सीतायै नम:' 
- ॐ जानकीवल्लभाय नमः 

महत्व-Importance
 
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार फाल्गुन कृष्ण अष्टमी तिथि को माता सीता धरती पर अवतरित हुए थी। इसीलिए इस दिन श्री जानकी जयंती (Janaki Jayanti 2022) पर्व मनाया जाता है। वे महाराज जनक की पुत्री थीं और विवाह पूर्व महाशक्तिस्वरूपा थी। माता सीता एक आदर्श पत्नी मानी जाती है। अपने दोनों पुत्रों लव-कुश को वाल्मीकि के आश्रम में अच्छे संस्कार देकर उन्हें तेजस्वी बनाया। इसीलिए माता सीता भगवान श्री राम की श्री शक्ति है। अत: फाल्गुन कृष्ण अष्टमी का व्रत रखकर सुहागिन महिलाएं सुखद दांपत्य जीवन की कामना की जाती है। सीता जैसे गुण हमें भी प्राप्त हो इसी भाव के साथ यह व्रत रखा जाता है। जानकी जयंती के दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए प्रभु श्री राम और माता सीता का पूजन करती हैं, तथा व्रत रखती है। 

हिन्दी अर्थसहित जानकी स्तोत्र-Janki Stotram 
 
नीलनीरज-दलायतेक्षणां लक्ष्मणाग्रज-भुजावलम्बिनीम्।
शुद्धिमिद्धदहने प्रदित्सतीं भावये मनसि रामवल्लभाम्।।
- नील कमल-दल के सदृश जिनके नेत्र हैं, जिन्हें श्रीराम की भुजा का ही अवलंबन है, जो प्रज्वलित अग्नि में अपनी पवित्रता की परीक्षा देना चाहती हैं, उन रामप्रिया श्रीसीता माता की मैं मन-ही-मन में भावना (ध्यान) करता हूं।
 
रामपाद-विनिवेशितेक्षणामङ्ग-कान्तिपरिभूत-हाटकाम्।
ताटकारि-परुषोक्ति-विक्लवां भावये मनसि रामवल्लभाम्।।
- जिनके नेत्र श्रीराम जी के चरणों की ओर निश्चल रूप से लगे हुए हैं, जिन्होंने अपनी अङ्गकान्ति से सुवर्ण को मात कर दिया है तथा ताटका के वैरी श्रीरामजी के (द्वारा दुष्टों के प्रति कहे गए) कटु वचनों से जो घबराई हुई हैं, उन श्रीराम जी की प्रेयसी श्रीसीता मां की मैं मन में भावना करता हूं।
 
कुन्तलाकुल-कपोलमाननं, राहुवक्त्रग-सुधाकरद्युतिम्।
वाससा पिदधतीं हियाकुलां भावये मनसि रामवल्लभाम्।।
-  जो लज्जा से हतप्रभ हुईं अपने उस मुख को, जिनके कपोल उनके बिथुरे हुए बालों से उसी प्रकार आवृत हैं, जैसे चन्द्रमा राहु द्वारा ग्रसे जाने पर अंधकार से आवृत हो जाता है, वस्त्र से ढंक रही हैं, उन राम-पत्नी सीताजी का मैं मन में ध्यान करता हूं।
 
कायवाङ्मनसगं यदि व्यधां स्वप्नजागृतिषु राघवेतरम्।
तद्दहाङ्गमिति पावकं यतीं भावये मनसि रामवल्लभाम्।।
- जो मन-ही-मन यह कहती हुई कि यदि मैंने श्रीरघुनाथ के अतिरिक्त किसी और को अपने शरीर, वाणी अथवा मन में कभी स्थान दिया हो तो हे अग्ने! मेरे शरीर को जला दो अग्नि में प्रवेश कर गईं, उन रामजी की प्राणप्रिय सीता जी का मैं मन में ध्यान करता हूं।
 
इन्द्ररुद्र-धनदाम्बुपालकै: सद्विमान-गणमास्थितैर्दिवि।
पुष्पवर्ष-मनुसंस्तुताङ्घ्रिकां भावये मनसि रामवल्लभाम्।।
- उत्तम विमानों में बैठे हुए इंद्र, रुद्र, कुबेर और वरुण द्वारा पुष्पवृष्टि के अनंतर जिनके चरणों की भली-भांति स्तुति की गई है, उन श्रीराम की प्यारी पत्नी श्रीसीता माता की मैं मन में भावना करता हूं।
 
संचयैर्दिविषदां विमानगैर्विस्मयाकुल-मनोऽभिवीक्षिताम्।
तेजसा पिदधतीं सदा दिशो भावये मनसि रामवल्लभाम्।।
- (अग्नि-शुद्धि के समय) विमानों में बैठे हुए देवगण विस्मयाविष्ट चित्त से जिनकी ओर देख रहे थे और जो अपने तेज से दसों दिशाओं को आच्छादित कर रही थीं, उन रामवल्लभा श्रीसीता मां की मैं मन में भावना करता हूं। ।।इति जानकी स्तोत्रं सम्पूर्णम्।।

जानकी जयंती के शुभ मुहूर्त-janki jayanti 2022 muhurt
 
जानकी जयंती की उदयातिथि, गुरुवार 24 फरवरी 2022।
फाल्गुन कृष्ण अष्टमी तिथि का प्रारंभ बुधवार, 23 फरवरी 2022 को शाम 04.56 मिनट से 
समापन गुरुवार, 24 फरवरी 2022 03.03 मिनट तक। 

Sita Mata Ji Ki Aarti : सीता माता की आरती
 
आरति श्रीजनक-दुलारी की। सीताजी रघुबर-प्यारी की।।
जगत-जननि जगकी विस्तारिणि, नित्य सत्य साकेत विहारिणि।
परम दयामयि दीनोद्धारिणि, मैया भक्तन-हितकारी की।।
आरति श्रीजनक-दुलारी की।
 
सतीशिरोमणि पति-हित-कारिणि, पति-सेवा-हित-वन-वन-चारिणि।
पति-हित पति-वियोग-स्वीकारिणि, त्याग-धर्म-मूरति-धारी की।।
आरति श्रीजनक-दुलारी की।।
 
विमल-कीर्ति सब लोकन छाई, नाम लेत पावन मति आई।
सुमिरत कटत कष्ट दुखदायी, शरणागत-जन-भय-हारी की।।
आरति श्रीजनक-दुलारी की। सीताजी रघुबर-प्यारी की।।

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