गुरुवार, 26 मार्च 2026
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Written By WD Feature Desk

Mata skandamata: नवरात्रि की पंचमी की देवी मां स्कंदमाता: अर्थ, पूजा विधि, आरती, मंत्र, चालीसा, कथा और लाभ

Devi Skandmata
Maa skandamata: शारदीय या चैत्र नवरात्रि के पांचवें दिन यानी पंचमी को माता स्कंदमाता की पूजा होती है। इस देवी की चार भुजाएं हैं। ये दाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद को गोद में पकड़े हुए हैं। नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प है। बाईं तरफ ऊपर वाली भुजा में वरदमुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है। इनका वर्ण एकदम शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसीलिए इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। सिंह इनका वाहन है।
 
सिंहसनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी॥
 
 

1. मां स्कंदमाता का अर्थ

नवरात्रि के पांचवें दिन की देवी स्कंदमाता है। स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता के कारण इन्हें स्कंदमाता नाम से अभिहित किया गया है। इनके विग्रह में भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में विराजित हैं।
 

2. मां स्कंदमाता की पूजा विधि

  • सबसे पहले चौकी (बाजोट) पर स्कंदमाता की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
  • इसके बाद गंगा जल या गोमूत्र से शुद्धिकरण करें।
  • चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर कलश रखें।
  • उसी चौकी पर श्रीगणेश, वरुण, नवग्रह, षोडश मातृका या 16 देवी, सप्त घृत मातृका (7 सिंदूर की बिंदी लगाएं) की स्थापना भी करें।
  • इसके बाद व्रत, पूजन का संकल्प लें और वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा स्कंदमाता सहित समस्त स्थापित देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें।
  • इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दूर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्र पुष्पांजलि आदि करें।
  • तत्पश्चात प्रसाद वितरण कर पूजन संपन्न करें।
  • पंचमी तिथि के दिन पूजा करके भगवती दुर्गा को केले, अंगूर का भोग लगाना चाहिए और यह प्रसाद ब्राह्मण को दे देना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य की बुद्धि का विकास होता है।
 
स्कंदमाता देवी का मंत्र:
मंत्र: ॐ देवी स्कंदमातायै नमः॥
प्रार्थना:
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी॥
स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
 

3. मां स्कंदमाता की आरती-lyrics

।।माँ स्कंदमाता की आरती।।
जय तेरी हो स्कंद माता 
पांचवां नाम तुम्हारा आता 
सब के मन की जानन हारी 
जग जननी सब की महतारी 
तेरी ज्योत जलाता रहूं मैं 
हरदम तुम्हें ध्याता रहूं मैं   
कई नामों से तुझे पुकारा 
मुझे एक है तेरा सहारा 
कहीं पहाड़ों पर है डेरा 
कई शहरो मैं तेरा बसेरा 
हर मंदिर में तेरे नजारे 
गुण गाए तेरे भगत प्यारे 
भक्ति अपनी मुझे दिला दो 
शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो 
इंद्र आदि देवता मिल सारे 
करे पुकार तुम्हारे द्वारे 
दुष्ट दैत्य जब चढ़ कर आए 
तुम ही खंडा हाथ उठाए 
दास को सदा बचाने आई 
'चमन' की आस पुराने आई...। 
(समाप्त)
 

4. मां स्कंदमाता व्रत की कथा

धार्मिक पुराणों की कथा के अनुसार धरती पर तारकासुर का आतंक था। उसने देवलोक पर भी कब्जा कर लिया था। सभी देवता ब्रह्मा जी की शरण में गए तो उन्होंने कहा कि शिवपुत्र ही इसका अंत कर सकेगा। फिर शिव जी की तपस्या भंग की गई और बाद में माता पार्वती का शिवजी से विवाह हुआ। फिर माता पार्वती को एक पुत्र हुआ जिसका नाम स्कंद रखा गया जिसका दूसरा नाम कार्तिकेय भी था। माता पार्वती ने अपने पुत्र स्कंद को युद्ध के लिए शिक्षित करने के लिए स्कंद माता का रूप धारण किया और उन्होंने उन्हें अस्त्र शस्त्र विद्या सिखाई। स्कंदमाता से युद्ध प्रशिक्षण लेने के बाद भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर के साथ युद्ध किया और बाद में उनका अंत किया था। स्कंदमाता को इन नामों से भी जाना जाता है। स्कंदमाता, हिमालय की पुत्री पार्वती हैं। 
 

5. माता स्कंदमाता की चालीसा

॥ श्री स्कंदमाता चालीसा ॥
।।दोहा।।
जय गिरी तनये दक्षजे शम्भू प्रिये गुणखानि।
गणपति जननी पार्वती अम्बे! शक्ति! भवानि।
 
चौपाई
ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे,
पंच बदन नित तुमको ध्यावे।
षड्मुख कहि न सकत यश तेरो,
सहसबदन श्रम करत घनेरो।।
 
तेऊ पार न पावत माता,
स्थित रक्षा लय हिय सजाता।
अधर प्रवाल सदृश अरुणारे,
अति कमनीय नयन कजरारे।।
ललित ललाट विलेपित केशर,
कुंकुंम अक्षत् शोभा मनहर।
कनक बसन कंचुकि सजाए,
कटी मेखला दिव्य लहराए।।
कंठ मंदार हार की शोभा,
जाहि देखि सहजहि मन लोभा।
बालारुण अनंत छबि धारी,
आभूषण की शोभा प्यारी।।
नाना रत्न जड़ित सिंहासन,
तापर राजति हरि चतुरानन।
इन्द्रादिक परिवार पूजित,
जग मृग नाग यक्ष रव कूजित।।
गिर कैलास निवासिनी जय जय,
कोटिक प्रभा विकासिनी जय जय।
त्रिभुवन सकल कुटुंब तिहारी,
अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी।।
हैं महेश प्राणेश तुम्हारे,
त्रिभुवन के जो नित रखवारे।
उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब,
सुकृत पुरातन उदित भए तब।।
बूढ़ा बैल सवारी जिनकी,
महिमा का गावे कोउ तिनकी।
सदा श्मशान बिहारी शंकर,
आभूषण हैं भुजंग भयंकर।।
कण्ठ हलाहल को छबि छायी,
नीलकण्ठ की पदवी पायी।
देव मगन के हित अस किन्हो,
विष लै आपु तिनहि अमि दिन्हो।।
ताकी, तुम पत्नी छवि धारिणी,
दुरित विदारिणी मंगल कारिणी।
देखि परम सौंदर्य तिहारो,
त्रिभुवन चकित बनावन हारो।।
भय भीता सो माता गंगा,
लज्जा मय है सलिल तरंगा।
सौत समान शम्भू पहआयी,
विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी।।
तेहि कों कमल बदन मुरझायो,
लखी सत्वर शिव शीश चढ़ायो।
नित्यानंद करी बरदायिनी,
अभय भक्त कर नित अनपायिनी।।
अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनी,
माहेश्वरी, हिमालय नन्दिनी।
काशी पुरी सदा मन भायी,
सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी।।
भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री,
कृपा प्रमोद सनेह विधात्री।
रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे,
वाचा सिद्ध करि अवलम्बे।।
गौरी उमा शंकरी काली,
अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली।
सब जन की ईश्वरी भगवती,
पतिप्राणा परमेश्वरी सती।।
तुमने कठिन तपस्या कीनी,
नारद सों जब शिक्षा लीनी।
अन्न न नीर न वायु अहारा,
अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा।।
पत्र घास को खाद्य न भायउ,
उमा नाम तब तुमने पायउ।
तप बिलोकी ऋषि सात पधारे,
लगे डिगावन डिगी न हारे।।
तब तव जय जय जय उच्चारेउ,
सप्तऋषि निज गेह सिद्धारेउ।
सुर विधि विष्णु पास तब आए,
वर देने के वचन सुनाए।।
मांगे उमा वर पति तुम तिनसों,
चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों।
एवमस्तु कही ते दोऊ गए,
सुफल मनोरथ तुमने लए।।
करि विवाह शिव सों भामा,
पुनः कहाई हर की बामा।
जो पढ़िहै जन यह चालीसा,
धन जन सुख देइहै तेहि ईसा।।
 
।। दोहा ।।
कूटि चंद्रिका सुभग शिर,
जयति जयति सुख खा‍नि,
पार्वती निज भक्त हित,
रहहु सदा वरदानि।
॥ इति श्री स्कंदमाता चालीसा सम्पूर्ण ॥
 

6. मां स्कंदमाता की पूजा का लाभ

1. संतान सुख की प्राप्ति
2. मोक्ष और परम शांति का मार्ग
3. ज्ञान और बुद्धि का विकास
4. विशुद्ध चक्र का जागरण
5. रोगों से मुक्ति और आरोग्य
6. निर्भयता और साहस
7. यदि आप माँ को केले का भोग लगाकर उसे गरीबों में बांटते हैं, तो व्यापार और नौकरी में आ रही बाधाएं दूर होने लगती हैं।
 

7. मां स्कंदमाता पर पूछे जाने वाले प्रश्‍न-FAQs

1. "स्कंदमाता" नाम का अर्थ क्या है?
भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का एक नाम 'स्कंद' भी है। स्कंद (कार्तिकेय) की माता होने के कारण ही उन्हें 'स्कंदमाता' कहा जाता है।
 
2. माँ स्कंदमाता का स्वरूप कैसा है?
  • माँ की चार भुजाएँ हैं। ऊपर की दो भुजाओं में वे कमल के पुष्प धारण करती हैं।
  • एक हाथ में उन्होंने अपने पुत्र स्कंद (बाल रूप) को गोद में लिया हुआ है।
  • चौथा हाथ वरद मुद्रा (आशीर्वाद देने वाली स्थिति) में रहता है।
  • वे कमल के आसन पर विराजमान हैं, इसलिए उन्हें 'पद्मासना' भी कहा जाता है। उनका वाहन सिंह है।
 
3. माँ स्कंदमाता की पूजा से कौन सा 'चक्र' जाग्रत होता है?
योग साधना करने वालों के लिए यह दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इस दिन साधक का मन 'विशुद्ध चक्र' में स्थित होता है। इससे वाणी में मधुरता आती है और एकाग्रता बढ़ती है।
 
4. संतान प्राप्ति के लिए माँ की पूजा क्यों विशेष है?
चूंकि माँ स्कंदमाता अपने पुत्र स्कंद को गोद में लिए हुए हैं, इसलिए ऐसी मान्यता है कि जो दंपत्ति संतान सुख चाहते हैं, उन्हें माँ के इस स्वरूप की पूरी श्रद्धा से पूजा करनी चाहिए। माँ अपने भक्तों को संतान की रक्षा और सुख का आशीर्वाद देती हैं।
 
5. माँ को कौन सा 'भोग' (प्रसाद) प्रिय है?
माँ स्कंदमाता को केले (Banana) का भोग लगाना अत्यंत प्रिय माना जाता है। इसके अलावा उन्हें केसर की खीर या सफेद रंग की मिठाइयाँ भी अर्पित की जा सकती हैं।
 
6. माँ स्कंदमाता की पूजा के लिए शुभ रंग कौन सा है?
इस दिन सफेद (White) या पीला (Yellow) रंग के वस्त्र पहनना बहुत शुभ होता है। सफेद रंग शांति का और पीला रंग ज्ञान व प्रसन्नता का प्रतीक है।
 
7. क्या माँ स्कंदमाता की पूजा से कार्तिकेय जी की भी कृपा मिलती है?
हाँ, माँ स्कंदमाता की विशेषता यह है कि उनकी पूजा करने से भगवान कार्तिकेय की पूजा अपने आप हो जाती है। भक्त को माता और पुत्र दोनों का आशीर्वाद एक साथ प्राप्त होता है।
 
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