Made in India German Submarines: जर्मनी की जगप्रसिद्ध इस्पात (स्टील) निर्माता कंसर्न थ्यिसनक्रुप केवल इस्पात ही नहीं, हथियार आदि भी बनाती है। जर्मनी के धुर उत्तर में स्थित बंदरगाह नगर कील में 'थ्यिसनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS)' नाम की उसकी शाखा समुद्री जहाज़ और नौसैनिक पनडुब्बियां बनाने के लिए प्रसिद्ध है।
अकेले 'थ्यिसनक्रुप मरीन सिस्टम्स' का कोरोबार ही उसके इतिहास में इस समय सबसे अधिक तेज़ी से बढ़ रहा है। पिछले छह महीनों में उसे 20 अरब 60 करोड़ यूरो (1 यूरो=112 रुपए) के बराबर नए ऑर्डर मिले। जल्द ही भारत से भी एक बड़ा ऑर्डर मिलने वाला है। भारत की P75(I) खरीद योजना के तहत, भारतीय नौसेना के लिए छह अत्याधुनिक पनडुब्बियां बनाई जानी हैं—जिनकी कुल कीमत लगभग आठ अरब यूरो होगी।
इस समय बातचीत अंतिम चरण में है
TKMS और मुंबई स्थित भारत की सरकारी कंपनी 'मज़गांव डॉक शिपयार्ड' (MDL), सितंबर 2025 से भारतीय खरीद प्राधिकरण के साथ आधिकारिक बातचीत कर रहे हैं। TKMS के मीडिया अधिकारी नील्स बायर का कहना है कि 'TKMS और भारतीय खरीद प्राधिकरण इस समय बातचीत के अंतिम चरण में हैं। ...हम इस समय किसी भी खास जानकारी के बारे में कोई विवरण नहीं देना चाहते।'
भारत के साथ इस सौदे के महत्व को रेखांकित करते हुए बायर का मत है कि 'भारत, रणनीतिक रूप से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों में से एक है— और प्रोजेक्ट P75(I) भारत की सागरीय क्षमताओं को मज़बूत करने का एक अहम प्रोग्राम है। TKMS के लिए, यह संभावित साझेदारी एक महत्वपूर्ण औद्योगिक अवसर और एक लंबे समय तक चलने वाला रणनीतिक सहयोग, दोनों का प्रतिनिधित्व करती है।'
पनडुब्बियां मुंबई में बनेंगी
पनडुब्बियां जर्मनी में नहीं, मुंबई में बनाई जाएंगी। TKMS डिज़ाइन और टेक्नॉलॉजी पार्टनर की भूमिका निभाएगा। वह भारत को पनडुब्बी का डिज़ाइन, उससे जुड़ी ज़रूरी जानकारी और दुनिया भर में इसी तरह के पनडुब्बी प्रोग्रामों से मिला अपना अनुभव भारत को देगा — जिसमें वायुमुक्त प्रणोदन (एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन) और पनडुब्बियों को अदृश्य बनाए रखने के स्टेल्थ सिस्टम जैसी आधुनिक तकनीकें भी शामिल हैं। तकनीकी प्रणालियों का समेकन और पनडुब्बियों की डिलीवरी, भारत में ही स्थानीय स्तर पर होगी।
अप्रैल के अंत में, भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके जर्मन समकक्ष बोरिस पिस्टोरियुस ने कील में पनडुब्बी निर्माण स्थल की यात्रा की। यह एक असामान्य रूप से उच्च-स्तरीय यात्रा थी जो इस सौदे के महत्व को रेखांकित करती है। पनडुब्बियों के निर्माण-परिसर के दौरे और एक पनडुब्बी U34 पर जाने के बाद, पिस्टोरियुस ने कहा कि 'जर्मन-भारतीय पनडुब्बी परियोजना P75(I) को एक संभावित प्रमुख परियोजना माना जाता है। मुझे पूरा विश्वास है कि हम बहुत जल्द ही इस समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे।' इस यात्रा के बाद, राजनाथ सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि उन्हें 'अत्याधुनिक तकनीकों और उन्नत समुद्री-सैन्य क्षमताओं' से परिचित कराया गया।
संभावित सौदे के पूरक के तौर पर, दोनों सरकारों ने बर्लिन में रक्षा औद्योगिक सहयोग के लिए एक दस-वर्षीय रोडमैप पर हस्ताक्षर किए, साथ ही संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों से संबंधित सहयोग के एक समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किए।
इस साल भारत-जर्मन राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष पूरे होंगे
भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की यह यात्रा प्रतीकात्मक रूप से एक महत्वपूर्ण वर्ष के दौरान हुई है: 2026 में, जर्मनी और भारत अपने बीच राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष पूरे होने का उत्सव मनाएंगे। इस संदर्भ में, जर्मन रक्षा मंत्री पिस्टोरियुस ने इस समय के वैश्विक भू-राजनीतिक आयाम की ओर ध्यान खींचते हुए कहा: 'हमारे लिए, भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारों में से एक है।'
कहने की आवश्यकता नहीं कि रक्षा के क्षेत्र में, भारत रूस के साथ अपना चिरपरिचित सहयोग जारी रखे हुए है, पर साथ ही अन्य देशों के साथ भी अपने सहयोग-क्षेत्र का विस्तार कर रहा है। जर्मनी ऐसे ही अन्य देशों में से एक है। प्रधानमंत्री मोदी का भारत अब केवल ख़रीददार नहीं रहना चाहता। वह जो भी हथियार या सामग्री ख़रीदता है, उसे इस शर्त पर ख़रीदता है कि उसके निर्माण की तकनीक भारत को हस्तांतरित की जाएगी, ताकि भारत जल्द ही उसे स्वयं बना सके। इसीलिए, सौदा पट जाने पर जर्मनी से ख़रीदी जा रही 6 नौसैनिक पनडुब्बियां, कील में नहीं मुंबई में बनेंगी। प्रतिरक्षा के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर भारत बनने का यह एक और बड़ा उदाहरण होगा।