कारगिल युद्ध: सचमुच भारत ने जंग जीती थी?

--सुरेश एस डुग्गर--

आजादी के बाद कारगिल का युद्ध पहला ऐसा युद्ध था जिसमें को पाकिस्तान की धरती पर नहीं बल्कि अपनी ही धरती पर दुश्मन से उलझना पड़ा था। ठीक इसी प्रकार की उलझन वह कश्मीर में आतंकवाद के रूप में भारत के गले 1989 से डाल चुका है। उलझन भी ऐसी कि अपने ही पहाड़ अपने जवानों के लिए मौत का ग्रास बन रहे हैं।


इस सच्चाई से इंकार नहीं कि कारगिल के पहाड़ों की परिस्थितियां कई भारतीय जवानों के लिए घातक व जानलेवा साबित हुई हैं। माना कि पाकिस्तान के 2700 से अधिक जवान व अधिकारी मारे गए, परंतु पाकिस्तान ने अभी भी दोस्ती की आड़ में भारत की पीठ में छुरा घोंपना छोड़ा नहीं है। वह भारत के संयम की परीक्षा ले रहा है। भारत के संयम बरतने की नीति व प्रवृत्ति का पाकिस्तान सच में गलत लाभ उठा रहा है। हालांकि यह उसकी पुरानी फितरत है और जिसे भारत बार-बार अवसर प्रदान कर रहा है।
सभी मानते हैं कि राजनयिक मोर्चे पर सफलता व कामयाबी मिली थी। परंतु यह कामयाबी उन जख्मों को शायद ही कभी भर पाएगी जो कारगिल में शहीद होने वाले परिवारों के सदस्यों के दिलों पर लगे थे।


तीन प्रत्यक्ष युद्धों में पराजय का मुंह देखने के उपरांत पाकिस्तान ने जिन नीतियों का निर्धारण भारत को मुसीबत में डालने के लिए किया वे आज भारत सरकार के लिए परेशानी का कारण बनी हुई हैं।

इस घटनाक्रम में ताजा नीति कारगिल में लड़ी गई लड़ाई थी जि‍सको हालांकि हमने जीत तो लिया लेकिन पाकिस्तान ने कारगिल में सारा साल अपनी फौजें तैनात करने का कार्य भारत के कांधों पर डाल नया आर्थिक मोर्चा खोल दिया।

कारगिल में सारा साल सैनिकों की तैनाती की आवश्यकता अब इसलिए हो चुकी है, क्योंकि पाकिस्तानी सेना गलत हरकतें करने से कभी भी बाज नहीं आती चाहे उसे कितनी बार पराजय का मुंह देखना पड़े। सियाचिन में भी यही हो रहा है। 14 अप्रैल 1984 को आरंभ हुआ ऑपरेशन मेघदूत अभी तक समाप्त नहीं हुआ है, जो अनुमानतः कई लाख करोड़ करोड़ रुपया डकार चुका है।
रक्षा विशलेषकों के अनुसार पाकिस्तान असल में भारत के विरुद्ध आर्थिक युद्ध भी छेड़ना चाहता है। राज्य में चल रहे तीनों ऑपरेशनों को रक्षा विशेषज्ञ आर्थिक युद्ध का ही नाम देते हैं। हालांकि वे इसे दीर्घकालिक युद्ध का नाम भी देते हैं, क्योंकि 1947, 65 तथा 71 की तरह ये तीनों युद्ध कुछ दिनों तक नहीं बल्कि महीनों और सालों से चल रहे हैं।
इन सारे सवालों के उत्तर की प्रतीक्षा हिन्दुस्तान की जनता को 15 सालों से है। उन परिवारों को है जिनके सदस्य कारगिल में शहीद हो गए। ऐसा नहीं है कि अपने प्रियजनों की शहादत पर उन्हें दुख या गिला हो। बल्कि दुख और गिला इस बात पर है कि राजनीतिक मोर्चों पर होने वाली गलतियां उनके प्रियजनों को लील गई थीं। अब वे नहीं चाहते कि और परिवारों के प्रियजनों को यह गलतियां लील लें। (भाषा)



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