जानिए नाग पूजा की पृष्ठभूमि...

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यद्यपि प्राचीन भारत की नाग जातियों का इतिहास अभी पूर्णत: स्पष्ट नहीं है, फिर भी इतना तो कहा जा सकता है कि उनके वंश में आर्यों की ही भांति ऋषि, म‍ुनि, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णों का समावेश था। कुछ शिलालेखों के माध्यम से उनका कश्यप गोत्रीय होना भी स्पष्ट होता है, नागों के आवास स्थल के संबंध में 'खाण्डव-दहन-पर्व' महाभारत से जानकारी प्राप्त होती है।

नाग जाति अत्यंत प्रभुता संपन्न थी। भारत के विभिन्न स्थानों में उनके आवासीय ध्वंसावशेष इस बात का प्रमाण हैं। वे शक्तिशाली होने के साथ-साथ कुशल नाविक भी थे। उनकी सहायता से ही देवों ने समुद्र पार किया था।

'नंदलाल देकृत रसातल' में इस बात का उल्लेख है कि तुर्किस्तान का नाम नागलोक था। तुर्क नागवंशीय हैं। तुर्कों की उपजातियां सेंस, यासक आदि शेष एवं वासुकी के नाम पर हैं। उत्तरी तुर्किस्तान को काम्बोज कहा गया है। डबरा (ग्वालियर) के पास खुदाई में कुछ समय पूर्व ही नाग शासकों के सिक्के मिले थे। ग्वालियर संभाग में ही ‍‍'पिछोर' के केयूर पर्वत पर आज भी नागवंशीय महल है। नरवर में भी उनका शासन था।

- डॉ. अन्नपूर्णा भदौरिय




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