sawan somwar
Sat, 1 Aug 2026

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बड़ों के साथ, मनु की बात....

शैली बक्षी खडकोतकर  मेरा ब्लॉग
“नाना, आपकी पसंद तो बिलकुल पुराने ज़माने की है, आपके जैसी।”
 
“हांं! ये तो मनु की आवाज़ है।” मम्मा के कान सुन्न हो गए है।
 
‘ये लड़का क्या बोल रहा है और किसे? अगले पल की आशंका में मम्मा के कदम खुद ब खुद मनु की आवाज़ की दिशा में उठ गए हैं।  
“क्या नाना, थोड़े तो स्टाइलिश शूज़ लेने थे’ मनु नाना के कैनवास पम्प शूज़ का सूक्ष्म निरिक्षण कर रहा है, “और मुझे पता है, आप ये जूते सिर्फ वॉक के लिए तो नहीं पहनोगे। आप तो यह पहन कर पार्टी में भी जा सकते हो।” 
 
मम्मा की सांस अटक गई है, चाहकर भी आवाज नहीं निकल पा रही है। मनु अब डांट खाने वाला है?
 
“हा –हा ! अरे, ये क्या बुरे हैं? मजबूत कितने है, देख” मनु के सिर पर चपत लगते हुए नाना ठहाका लगाकर हंंस रहे है।
 
अभी जो देखा, क्या वो सच है?
 
छोटे भाई-बहन, भांजे, अपने बच्चे और भतीजे, इस तरह गिना जाए तो कुल जमा चार पीढियां नाना के रौब-रुआब का देखते-देखते बड़ी हो गई। पर उनमें से किसी ने सपने में भी उनसे ऐसे बात की होगी? यूं घर में बोलने की आज़ादी तो सबको रही है पर नाना का व्यक्तित्व और मान ही ऐसा है कि एक आदरयुक्त अंतर अपने-आप स्थापित हो जाता। मम्मा ने ही गाहे-बगाहे कुछ मसलों पर पिता से तर्क करने का दुस्साहस किया होगा, पर यह बिलास भर का छोकरा सीधे छलांग लगा कर वनराज के सामने है, बल्कि बड़े आराम से उनकी अयाल से खेल रहा है... 
 
सच है कि मूल धन से ब्याज प्रिय होता है। इसलिए नाती-पोतों से बुजुर्गों का विशेष स्नेह भी सच है। पर बड़ों के साथ सम्मान की सीमा-रेखा का ख्याल तो बच्चों को रखना ही चाहिए न। मम्मा ने पहले भी महसूस किया है कि मनु और शायद उसकी पूरी पीढ़ी को यह सम्मानजनक अंतर रखते नहीं आता। मनु नाना को नाना और दादी को दादी बुलाता है, यही गनीमत। वरना नानी तो नानू हो गई है और दादा रह गए है ‘डा’। सीधे-सरल व्यक्तित्व के दादा के साथ उसका निरंतर सानिध्य भी है और लाड़ भी अनोखा है। 
 
“डा, बहुत इज़ी है. आप देखो, मैं फिर से करके दिखाता हूं” मनु दादा को मोबाइल का प्रयोग करना सिखा रहा है।
 
 दादा का पिछला जन्मदिन।  मनु मम्मा-पापा के साथ जाकर चुपके-से सफारी-सूट सिलवा लाया। उसकी जिद पर दादा ने जब पहना, तो “मेरे डा, सबसे हैण्डसम” करके गले लग गया। दादी के जन्मदिन की सरप्राइज़ पार्टी में अपने ही चार दोस्तों को बुलाकर, केक कटवाकर, हैप्पी बर्थडे गाया गया। 
 
जब नाना-नानी के साथ हो, तब भी यही बेतकल्लुफी। 
 
“मनु, क्या स्कोर आएगा, टेंथ बोर्ड में?”
 
“नाना, CGPA आएगा.” मनु नाना को CGPA की चक्रव्यूह-रचना समझा रहा है। 
 
“हां, वही तुम्हारा GPC, कितना आएगा?” (CGPA की संरचना शायद DNA से भी जटिल है, मनु की लाख कोशिश के बाद भी नाना को समझ नहीं आया है।) 
 
 “नाना, देखिए!” मनु की आंखों में शरारत उतर आई है, “आप तो खुद आध्यात्मिक टाइप के है न, बस! मैं भी बहुत संतोषी प्राणी हूं। कर्म कर दो और फल याने मार्क्स गुरु पर छोड़ दो, जो दे दें, उसमें खुश रहो। लालच क्यों करना?” नाना को हंसते-हंसते ठसका लग गया है। मम्मा पानी लाने उठी, तब तक मनु फ्रिज से बोतल निकाल लाया है। 
  मम्मा ने सोच लिया है, ‘आज रात को मनु से बात करनी होगी। कहीं मस्ती-मजाक में, अनजाने में ही सही, बड़ों को ठेस न पहुंचा दे।’
 
“मनु, तुमसे कुछ बात करनी है।”
 
“मम्मा, पहले मेरी बात सुनो न! आपको पता है, जब यह घर बनवाया तो नाना और दोनों छोटे नाना साइकिल पर ईट-सीमेंट सारा सामान लेकर आते थे, सात कि.मी दूर से. नाना बता रहे थे।”
 
“और क्या बताया?”
 
“और गांंव के किस्से, फिर वहां से कैसे शहर आए, पढ़ाई की, नौकरी के लिए स्ट्रगल और इतनी बड़ी जॉइंट फैमिली..... बाप रे ...!” मनु अपनी रौ में बोलता जा रहा है, “और नानू ! उन्होंने तो चिमनी में पढ़ाई की। तब पी.जी करना बहुत बड़ी बात थी, है न? खासकर लडकियों के लिए। वैसे स्ट्रगल तो अपने डा ने भी बहुत किया।  उनके पापा तो बचपन में ही चले गए थे न। और दादी ने तो जॉब किया। मम्मा, पहले लोगों की लाइफ कितनी मुश्किल थी। ”
 
ओह! तो मनु सिर्फ अपनी ही नहीं कहता, बुजुर्गों की सुनता भी है। उनके बीच एक भावनात्मक संवाद सेतू है। शायद मम्मा की दृष्टि ही गलत थी। नई पीढ़ी के बच्चे स्पष्टवादी हैं, उनके व्यवहार में सहज खुलापन है पर वे अशिष्ट नहीं है और संवेदनहीन तो बिलकुल नहीं। हां, उनका अपना तरीका है, रिश्ते निभाने का। पर इसका मतलब यह कतई नहीं कि इससे रिश्तों को ठेस ही लगेगी। और सबसे महत्वपूर्ण बात, रिश्ता कोई भी हो, जब दोनों पक्ष इस रिश्ते का आनंद ले रहे हों, तो नियमों की दरकार नहीं रह जाती। बल्कि किसी भी तीसरे का हस्तक्षेप उस रिश्ते के स्वाभाविकता को नष्ट करता है, उसकी सहज गति को भंग करता है। 
 
“मम्मा, आप क्या कहने वाली थीं?”
 
“कुछ खास नहीं, बच्चे, अब सो जाओ.” मम्मा ने मनु के सिर पर हल्की-सी थपकी दी। 
 
“नानू, जल्दी आओ. आपके तो किचन के काम ही खत्म नहीं होते। देखो न, क्या मस्त मूवी है! मनु नाना के साथ टीवी पर किशोर दा की ‘हाफ टिकिट’ देख रहा है। 
 
“देखा! हमारे ‘पुराने जमाने’ की पिक्चर आज भी मज़ा देती है ना? ओल्ड इज़ गोल्ड।” नाना मनु को छेड़ रहे हैं। 
 
“वो तो है नाना, पर नए जमाने के पॉपकॉर्न के बिना मूवी का मज़ा अधूरा है। मम्मा, आप साइड में बैठ जाओ न, प्लीज़. आप हमारे बीच आ रही हो।”
 
“हां बेटा, सचमुच, मैं बीच में आ रही थी। अच्छा हुआ, तुमने रोक लिया।” मम्मा मुस्कुराते हुए दूसरी तरफ बैठ गई हैं। 
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