सच्चा धर्म निहित है मानवीयता में

True religion lies in humanity
Author प्रज्ञा पाठक|

प्राय: देखा जाता है कि हमारा समाज के विषय में अत्यंत होता है। धार्मिक परंपराओं के रूढ़िवादी पालन में शिक्षित-अशिक्षित एक ही तुला पर तुलते हैं। उदाहरण के लिए नित्य पूजा को लेकर कई परिवारों में बड़े सख्त नियम होते हैं। यदि घर का मुखिया पूजागृह में पूजा कर रहा है, तो उस समय पूरे घर में मार्शल लॉ लगा दिया जाता है। बच्चों को शोरगुल की अनुमति नहीं और बड़ों को ऊंची आवाज में बोलने पर पाबंदी। मानो घर, घर न होकर क्लास रूम हो।
इसी प्रकार व्रत-उपवास के विषय में भी अनेक परिवार कठोर नियमों का अनुसरण करते हैं। विशेषकर महिलाएं यदि बाल्यावस्था में किसी व्रत को करना आरंभ करती हैं तो वृद्धावस्था तक उसे नहीं छोड़ती हैं, भले ही बेहिसाब कष्ट उठाना पड़े।

वे यह समझने को तैयार ही नहीं होतीं कि उम्र के हिसाब से उनका शरीर भी ढल चुका है और उनकी क्षमता पहले की तरह नहीं रही। व्रत-उपवास की इस सख्ती के चलते कई बार वे अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर बैठती हैं और गंभीर कष्टों का सामना करती हैं। उनके साथ घर के लोग भी परेशान होते हैं- मानसिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से।

ससुराल में रखने का विधान हो तो नववधू को भी इसके लिए बाध्य किया जाता है। अब यदि उसकी क्षमता नहीं है और फिर भी वह करेगी तो उसका अस्वस्थ होना तय है। कई बार तो इसके लिए उसे व्यंग्य बाणों का सामना भी करना पड़ता है, जो उसे मानसिक संत्रास देता है।

मुझे आज तक समझ न आया कि से पति की उम्र में कैसे वृद्धि होती है? जबकि हम कई नववधुओं को शीघ्र ही अपने पति को खोते देखने की अनेक घटनाएं आए दिन पढ़ते सुनते हैं। यह भी मेरी बुद्धि से बाहर की बात है कि नमकरहित मंगलवार व्रत करने से कैसे अच्छे वर की प्राप्ति होती है? जबकि ऐसी अनेक लड़कियों को या तो आजीवन अविवाहित रहते देखा है अथवा वही अच्छा वर उन्हें बहुत बहुत बुरे दिन दिखाते हुए पाया गया है।

इसी प्रकार शुक्रवार को 'वैभव लक्ष्मी' व्रत को कई-कई बार अलग-अलग प्रकार से करने वाले लोगों को निर्धन से संपन्न होते कभी नहीं देखा और शनिवार का व्रत रखने वालों को शनि की वक्रदृष्टि से मुक्त होते नहीं देखा। तो फिर ये सब बोझ क्यों हम अपने परिवार, समाज और हृदय पर ढोते फिरते हैं?

उतार फेंकिए इसे और धर्म को, धर्म पालन को। तनिक चिंतन की गहराई में उतरकर सोचिए, मनन कीजिए। की मूर्ति पूजा में दोष नहीं, लेकिन उसे हव्वा बनाकर नहीं, सहज भाव से करें और उससे भी बढ़कर यह कि भक्ति और आस्था न बाहरी शोरगुल से प्रभावित होती हैं और न ही बाह्याडंबरों की आग्रही हैं।
ये तो हृदय के विश्वास की वाणी में बोलती हैं और उसी में सुनी जाती हैं। ये परिजनों या अन्य किसी को प्रतिबंधों में नहीं रखतीं बल्कि उनके प्रति मुक्त हृदय से स्नेह का भाव रखते हुए अपनी आपाद मस्तक पवित्रता से आराध्य को प्रसन्न करती हैं।


इसी प्रकार व्रत-उपवास धार्मिक दबावों की भ्रामकता से मुक्त होकर शरीर को स्वस्थ रखने के लिए सीमित रूप में और यथाशक्ति किए जाएं तो उनकी सार्थकता है। धार्मिक भावना और आस्था थोपे गए दबाव से जन्मी हो तो तत्काल त्याज्य हैं। हां, यदि वे हृदय की सहज स्वीकृति की देन हों, तो प्रणम्य हैं। वैसे भी ईश्वर व्रत-उपवास और नित्य पूजा से नहीं बल्कि आपकी कर्मशीलता, कर्तव्यपरायणता और पुनीत भावों से प्रसन्न होता है।
मेरी दृष्टि में नेक इंसान बनने में निहित है जबकि हम प्रेम, दया, क्षमा, परोपकार, सहयोग को अपने वचनों और व्यवहार में जीते हों और सच्चा धर्म-पालन इस नेकनीयती को स्वयं जीकर अगली पीढ़ी को भी इन्हीं संस्कारों में दीक्षित करने में समाहित है।

ईश्वर यह नहीं देखता कि आप कितनी बार गए? कितनी देर उसकी मूर्ति के समक्ष बैठकर विधि-विधान से उसकी पूजा की? कितने वर्षों तक उसके नाम पर व्रत-उपवास किए? बल्कि वह तो यह देखता है कि उसने जो मानव गढ़ा, उसमें मानवीयता कितनी है?

अन्य शब्दों में कहें तो यह कि उसकी रुचि सत्य की राह पर चलकर स्वविकास करने और परोपकार के भाव को आचरण में जीने की ओर है अथवा आडंबरपूर्ण भक्ति के द्वारा परिजनों पर बलपूर्वक अपनी भययुक्त सत्ता स्थापित कर छल-छद्म के मार्ग का अनुगामी बनने में है।

निश्चित रूप से ईश्वर का अस्तित्व यदि कहीं है, तो वह मनुष्य में कपट और दिखावे से दूर की उपस्थिति देखना पसंद करेगा, क्योंकि ईश्वर की अवधारणा में कहीं भी छ्ल, असत्य और अनैतिकता नहीं है। वह तो पवित्र सत्, चित्, आनंद से भरा हुआ है। उसकी दिव्यता हृदय की निश्छलता और आचरण की शुचिता से ही निर्मित हुई है।

तो फिर हम क्यों उसके नाम पर व्यर्थ के दिखावे, और प्रतिबंधों के कंटकों से अपना और दूसरों का जीवन असहज बनाएं? बेहतर होगा कि सहज रहें, स्नेह से आपूरित रहें, मानवीयता में आस्था रखें। संभवत: यही राह आपके जीवन में एक दिन ईश्वरत्व को घटा देगी।


 

और भी पढ़ें :