सृष्टि का आनंद बनाम आनंद की सृष्टि!
सृष्टि मूलतः विराट नैसर्गिक ऊर्जा के अनन्त अद्भुत आनंद की प्रत्यक्ष अनुभूति हैं। आनंद का विस्तार सूक्ष्म रूप से समूची सृष्टि में व्याप्त है। आनंद मनुष्य के मन मात्र में ही नहीं मनुष्यों के समूचे चिंतन, मनन, सृजन से लेकर संपूर्ण जगत में स्थित वनस्पति जगत और प्राणी जगत में कई रूपों में जैसे जलचर, थलचर एवं नभचर में समान रूप से मौजूद हैं। ध्वनि तरंगों से लेकर प्रकाश की किरणें अपने आप में अद्भुत अनंत रूप स्वरूप में रचना संसार का सृजन करती है। प्रकाश की उपस्थिति जगत को चैतन्य स्वरूप में कायम रखकर सदा-सर्वदा गतिशील बनाए रखती है। सौर एवं गुरुत्वाकर्षणजन्य गति से उत्पन्न प्रकाश का अस्थाई अभाव चैतन्य स्वरूप को सुप्तावस्था में ले जाता है, ऐसी सुप्तावस्था की ओर जो चैतन्य को निरंतर ऊर्जावान बनाए रखने में हरक्षण प्रवृत्त रहती हैं।
सुप्तावस्था चैतन्य का विश्रांति काल है। चैतन्य अवस्था और सुप्तावस्था सृष्टि में व्याप्त जीवन के दो छोर की तरह से है। वायु और जल का प्रवाह अपने मंद मंद स्वरूप में जिस तरह से एक नए रचना संसार में आनंद को बिखेरता रहता है उसका कोई विकल्प नहीं है। जल और वायु सृष्टि के एक तरह से जनक है। गुरुत्वाकर्षण सृष्टि का कालजयी प्रवाह है। प्रवाह और वायु की तूफानी गति मूल रूप में जल और वायु कण होते हुए भी छोटी-छोटी तरंगों से लेकर भीषण सुनामी की सृष्टि कर आनन्द मिश्रित भय एवं जिज्ञासा की निरन्तर उत्पत्ति करती ही रहतीं हैं। इसके मूल में भी गुरूत्वाकर्षण ही है।
छोटे बड़े फल-फूल और कीट-पतंगों सहित असंख्य तितलियां और नाना प्रकार के रंग बिरंगे फूल एवं जीव एक प्राकृतिक जीवन्त दृश्य को उत्पन्न कर वनस्पति जगत में अनोखे जीवन चक्र को निरंतर बनाए रखते है। हमारी इस धरती पर जो कुछ भी मौजूद है सब एक दूसरे से भिन्न तो है ही साथ ही साथ अभिन्न भी है। हमारी सृष्टि में एक जैसी दो चीजें मौजूद ही नहीं हैं। एक ही वृक्ष पर लगने वाला हर एक पत्ता दूसरे पत्ते से भिन्न है यही भिन्नता और अभिन्नता की अनोखी अनन्त श्रृंखला है। जगत का अंतहीन विस्तार एक दूसरे से भिन्न है और जगत में उपस्थित सभी चीजें एक दूसरे से अभिन्न भी। भिन्नता और अभिन्नता की अनंत जुगलबंदी हमारी सृष्टि का सबसे विशालतम रूप स्वरूप ही तो है। सृष्टि में जो कुछ भी है वह एक दूसरे से भिन्न होकर भी मूल रूप से अभिन्न ही है।
आनन्द मिश्रित पंचतत्व यानी जल, वायु अवनी, अंबर और अग्नि। सृष्टि के विराट स्वरूप के रचयिता हैं। यह भी एक यक्ष प्रश्न हमारे सामने बार-बार उठता है कि सृष्टि के रचयिता जगत में पंचतत्व की उपस्थिति के कारण सृष्टि का निर्माण हुआ या जगत में पंचतत्व की उपस्थिति और गतिशील गतिविधियों ने सृष्टि के स्वरूप की उत्पत्ति की। जगत में सृष्टि की उत्पत्ति जीवन की अनंत श्रृंखला की निरन्तर गतिशीलता के फलस्वरुप हुई हैं। जीवन और जन्म दो अलग-अलग प्रवाह है। जन्म के साथ ही मृत्यु की अवश्यम्भावी उत्पत्ति जन्म का अविभाज्य अंग है। जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। जन्म और मृत्यु जीवन के दो छोर हैं। जो अजन्मा है वो अविनाशी है। सृष्टि और आनन्द जीवन का अद्भुत प्रवाह है जो एक दूसरे से भिन्न होकर भी अभिन्न हैं।
सृष्टि में मनुष्य की उपस्थिति से सृष्टि के अस्तित्व का साक्षात्कार मनुष्यों को हुआ। मनुष्यों के अन्तर्मन में आनन्द नहीं जन्मा होता तो समूची सृष्टि का प्रत्यक्ष साक्षात्कार ही मानव मन या जीवन को नहीं हो पाता। सृष्टि में प्राणि जगत और वनस्पति जगत की उत्पत्ति एवं निरंतरता के बीज सुप्तावस्था में होकर भी जाग्रत अस्तित्व में होने से ही जीवन की अंतहीन श्रृंखला का उदय हुआ है। जीवन मूलतः अनन्त जैविक ऊर्जा का मूल जैविक स्वरूप हैं। सृष्टि में जीवन व्याप्त है या ऊर्जा के जैविक स्वरूप से सृष्टि का विराट स्वरूप उदित हुआ है।
विराट और सूक्ष्म रूप का प्रत्यक्ष प्रमाण बूंद और समुद्र के रूप में जलबिंदु और जलराशि के रूप से हम सहजता से प्रत्यक्ष स्वरूप में साक्षात्कार हम मनुष्य रूप में निरंतर करते ही रहते हैं। अनंत जलबिंदु वायु में मौजूद होकर सृष्टि में बादलों का रूप स्वरूप अपने आप गुरुत्वाकर्षण शक्ति से प्राप्त कर पुनः वर्षा के रूप में अवनी और अंबर को अनंत जीवनी शक्ति प्रदान करते हुए समूचे चैतन्य स्वरूप को आनन्द से ओतप्रोत कर देते हैं।
सृष्टि के आनन्दमयी जीवन अनुभव को, सृष्टि का हर एक जीव महसूस तो करता है पर सृष्टि की गाथा को अभिव्यक्ति देने वाला मनुष्य ही सृष्टि के आनन्द के अनूठे अनुभव को अक्षर, शब्द और ध्वनि स्वरूप में अभिव्यक्त कर पाते हैं। इस विस्तार को सूत्र रूप में हम कह सकते हैं कि सृष्टि ही आनंद है और आनंद ही सृष्टि है। यह सूत्र भी भिन्न और अभिन्न जैसा ही निरंतर जगत में अस्तित्व में आया और सनातन काल से जगत को ऊर्जा के चैतन्य स्वरूप में हम सब को हर क्षण सृष्टि और आनन्द से साक्षात्कार कराता है।
लेखक के बारे में
अनिल त्रिवेदी (एडवोकेट)