पशु चिकित्सक थीं न, पाशविक पुरुषों का इलाज नहीं जानती थीं




नाम ............। पेशे से पशु चिकित्सक। शहर हैदराबाद। स्कूटी से घर जा रही थी। एक विशेष इलाके में स्कूटी खराब।

घबराहट में बहन को फोन, मदद की गुहार। मदद करने वाले बने दरिंदे। नृशंसताके साथ किया और फिर अत्यंत ही वहशी तरीके से जलाकर कर दी गई हत्या।

संवेदना के स्तर पर हिला देने वाली घृणित घटना। स्तब्धता के बीच सोच रही हूं कि कैसा कलेजा चीर देने वाला मंजर रहा होगा। जहां सहायता की उम्मीद के बीच ही उसे छलना से दबोच लिया गया होगा और निरं‍तर लूटने-खसोटने और नोचने के बाद बुरी तरह जला दिया होगा। बैंगलूरु हाइवे पर उसकी जली हुई लाश चीख चीख कर बता रही है कि कितना सुरक्षित है मेरा देश, कितनी सुरक्षित है मेरे देश की बेटियां।
जानती हूं कि फिर इसे धर्म के नाम पर जोड़कर एक शर्मनाक बहस जारी कर दी जाएगी। एक विशेष 'असुरक्षित' वर्ग और धर्मनिरपेक्ष चैनल चुप्पी साध लेंगे। पर सच तो यह है कि को सच कहने, सुनने और समझने की हमारी सारी ताकत स्वाहा हो गई है।

इसी देश में जहां बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा बुलंदी से बोला जाता है वहां बेटियां जल रही है, मर रही हैं, कट रही हैं, गायब हो रही हैं... कहां गई इंसानियत, कहां गई शर्म? जब छा रही है चारों तरफ हैवानियत और बचा है केवल बहस के लिए धर्म....

बेटियां तो सबकी साझा होती हैं। बहन सबकी एक सी होती है लेकिन कब और कैसे किस समय वह सिर्फ एक देह, एक शरीर, उपभोग की वस्तु, और चीज बना दी जाती है हम समझ भी नहीं पाते और 1 लाश हमें जली हुई मिलती है। इसी के साथ जल जाते हैं हमारे सारे संस्कार, हमारा अभिमान, हमारी संस्कृति, हमारी सुरक्षा और हमारी व्यवस्था....

आज जल गए हैं एक स्त्री के भीतर पलने वाले कोमल अरमान, जल गया है इस समाज का चरित्र, जल गया है नैतिकता का दावा, जल गया है स्वच्छ भारत का इरादा... यह कैसी स्वच्छता, यह कैसा परिवेश है जिसमें शहर की गंदगी दिमागों और व्यवहार में पनपने लगी है। न सिर्फ पनपने लगी है बल्कि सड़ांध मारते हुए फैलने लगी है।

इस बजबजाती घुटन से बाहर आना चाहती हूं, रो लेना चाहती हूं खुलकर इस देश की बेटी के लिए जो बिना किसी अपराध के सरे बाजार जलाकर पटक दी गई है....

थीं वह, पशुओं पर प्यार से हाथ फेर लेने पर पशु भी उसके हो जाते होंगे पर पाशविक वृत्ति के नपुंसक पुरुषों का इलाज नहीं जानती थीं वह। बहुत मुश्किल होता है पशु चिकित्सक का पेशा लेकिन पेशे से इतर इतना मर्मांतक दर्द उसके हिस्से आना है किसने सोचा था...
सोचती हूं क्या इस देश की सूनी सड़क पर स्कूटी का खराब होना इतना बड़ा अपराध है कि अधजली बनकर पड़े रहने का खामियाजा भुगतना पड़े?

सोच ही सकती हूं, लिख सकती हूं पर आज व्यथा की पराकाष्ठा है, फिर याद आ रहे हैं कुछ शब्द जो कभी इसी हद तक विचलित कर गए थे... निर्भया, दामिनी, फलक, गु‍ड़िया, कठुआ, इंदौर, दिल्ली, पठानकोट, अजमेर, नजाने कितने नाम, कितने शहर, हर शहर की न जाने कितनी कहानी, हर नाम की न जाने कितनी विभत्स दास्तान....फिर आंसू और फिर मौन... क्रोध है कि उबलता ही जा रहा है... अगली किसी घटना तक.. कितने बेशर्म होते जा रहे हैं हम, हमारा समाज...



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