तमसो मा ज्योतिर्गमय...

आइये, चलें...कोरोना के इस घनघोर अंधकार की लड़ाई में एक और ज्योति-प्रकाश अध्याय जोड़ने चलें। सिर्फ नौ मिनिट...क्योंकि ये लड़ाई है दिए की और तूफान की। पर अंत में हमेशा ऐसे तूफान रूपी अन्धकार को भी हार मान लेनी पड़ेगी जब हमारा पूरा देश अपनी देहरी पर अपने हाथों में दीप, रोशनी, ज्योति का पावन, तेजोमय हथियार लिए खड़ा होगा। कितना मनोरम दृश्य होगा...आत्मबल वृद्धि को अपने में समाए, देश हित की भावना से परिपूर्ण गौरवशाली मेरे देशवासी... आशा की किरण सजाए, जय विजय के विश्वास को हृदय में संचित किए।
हमारे देश का नाम भारत क्यों रखा गया- इस विषय में अनेक महापुरुषों से जुड़े हुए प्रसंगों का उल्लेख मिलता है, लेकिन इसका एक दार्शनिक पक्ष भी है। भारत शब्द में ‘भा’ का अर्थ है- ‘प्रकाश’ और ‘रत’ का अर्थ है- ‘लगा हुआ’। इसलिए भारत शब्द का अर्थ है ‘जो ज्ञान की खोज में लगा हुआ हो’।

हमारे देश में अज्ञान को अंधकार का और ज्ञान को प्रकाश का प्रतीक माना गया है। न्यूमैन ने भी कहा है-‘दयामय प्रकाश, मुझे राह दिखा, इस दु:खान्धकार के घेरे में से तू निकाले चला चल’। भारत में कठिनाइयों को अंधकार का और समाधान को प्रकाश का प्रतीक माना गया है।
वर्ष की सबसे काली रात्रि में भी यह देश दीपों का उत्सव मनाता है और समृद्धि की कामना करता है। यह देश ‘या निशा सर्व भूतानाम् तस्याम् जागर्ति संयमी’ कह कर अंधेरे में भी ज्ञान की साधना और तपस्या का सन्देश देता है। इसीलिए चारों ओर जब कठिनाइयों की कालिमा गहरा रही हो तब भी इस देश ने ‘आत्म दीपो भव’ का सन्देश दिया। यह सन्देश जब सामूहिक दीप वंदना के रूप में बदल जाए या प्रकाश की साधना में अभिव्यक्त होने लगे तो कोरोना जैसी महामारी के विरुद्ध एक इच्छाशक्ति जागृत करने में नि:संदेह सहायता प्राप्त होती है।
और कुछ नहीं तो हम अपने घर आंगन में ज्योति कलश तो छलका ही सकते हैं न। सबसे अधिक दैवी प्रकाश भी केवल उन्हीं हृदयों में चमकता है जो संसारी कूड़े करकट और मानवी नापाकज़ी से पाक़ साफ़ है। भले ही हम सी रोशनी सा उत्कर्ष न कर पायें पर जुगनू सा प्रयास तो कर ही सकते हैं। मैथिलिशरण गुप्त ने भी कहा है-

तम में तू भी कम नहीं, जी जुगनू बड़ भाग।
भवन भवन में दीप है, जा वन-वन में जाग।
लम्बी और दुष्कर वही राह होती है जो हमें नरक से प्रकाश की ओर ले जाती है। तो यह राह भी भलेही कठिन है। समय बड़ा ही मुश्किल है पर हमें अपने प्रयास नहीं छोड़ने चाहिए। विश्व गुरु भारत अपनी पुरातन आस्थाओं का पुन:निर्माण कर इस कोरोना राक्षस पर विजय पाने का मार्ग इन्हीं राहों में खोज रहा है।

कुतर्कियों का तो कोई निदान कभी हो ही नहीं सकता। भगवान राम को जो नहीं छोड़ते, अपने पैगम्बर और धर्मों को जो मान नहीं दे पा रहे, ऐसे जाहिलों के लिए कोई औषधि निर्मित नहीं हुई है सिवाय कड़े दण्ड के। पर हम तो पत्थर में भी भगवान पूजने वाली संस्कृति के साथ-साथ प्राणी मात्र में ईश दर्शन का दृष्टिकोण अपनाने वालों में से हैं।
फिर हम भी क्यों न एक प्रयास करें, नौ दिन देवी का कठोर तप कर सकतें हैं तो यह तो सिर्फ नौ मिनिट की ही बात है। आओ,
इस दिन को एक और दीपावली में बदल डालें क्योंकि यही तेजों का तेज है, ज्योति स्वरूप आत्मदेव, उसका न भूलना इसी का नाम प्रकाश है।

स्वामी रामतीर्थ ने भी कहा है- ‘यदि आप अपने मन की कालिमा और अहंकार के भाव को निकल दें तो आपके भीतर का प्रकाश भी अपने आप बाहर निकल आएगा।’
यही समय है...अज्ञानता, साम्प्रदायिकता, अशिक्षा, बैर-भाव, द्वेष के अंधकार से निकलिए।..जागिये...लड़िये सर पर मंडरा रहे इस काल से जो किसी का सगा नहीं है. न आपका न हमारा. तो आइये एक बार फिर भारत दिखा दे अपनी आध्यात्म शक्ति और एकता का चमत्कार. सिद्ध कर दें कि-

नया प्रकाश चाहिए, नया प्रकाश चाहिए
अतीत का सुवर्ण स्वर, सजीव और लाभ कर,
वही रखें न रूढ़ी के, निरर्थक दास चाहिए,
गिरा, विचार, तर्क पर हमें न पाश चाहिए,
विनाश की प्रथामृषा हरे तथा विकास चाहिए।
-प्रभाकर माचवे


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