विष्णु नागर : साहित्यकार-संपादक

Last Updated: सोमवार, 6 अक्टूबर 2014 (13:27 IST)
आप सबने निश्चित ही चमत्कारी पत्‍थर पारस की खूबी के बारे में सुना होगा। पारस से जंग लगे लोहे को स्पर्श भी करा दिया जाए तो वह चौबीस कैरेट का खरा सोना बन जाता है। पत्रकारिता और साहित्य के क्षे‍त्र में ऐसा ही एक नाम है। उन्होंने जिस काम को भी हाथ लगाया, वे ख्याति शिखर तक उसे लेकर गए।
संघर्ष, संवेदनशीलता, और सहजता की पूंजी के सहारे विष्णु नागर ने पत्रकारिता और फिर साहित्य में अपनी धमक दर्ज कराई। वर्ष 1974 में टाइम्स ऑफ इंडिया से बतौर ट्रेनी पत्रकार अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत करने वाले विष्णु नागर ने आगे चलकर कई मीडिया संस्‍थानों में प्रभावी भू‍मिका का सफलतापूर्वक निर्वहन किया।> > नवभारत टाइम्स में उन्होंने सबसे लंबी पारी खेली। यहां उन्होंने पूरे 23 साल तक अपनी सेवाएं दीं। 1998 में एचटी ग्रुप से जुड़कर हिन्दुस्तान के नेशनल ब्यूरो में काम किया तो 5 साल तक 'कादम्बिनी' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका का संपादन भी किया। इसी बीच पत्रकारिता के क्षितिज पर चमचमाते हिन्दी के इस सितारे ने दुनिया के आकाश में भी भारत की बिंदी को रोशन किया।
विख्यात रेडियो सर्विस डॉयचे वेले के बुलावे पर विष्णु नागर जर्मनी गए। वहां 2 साल तक डॉयचे वेले की हिन्दी सर्विस के के रूप में कार्य किया। निरंतर कर्मशील विष्णु नागर ने मध्यप्रदेश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्र 'नईदुनिया' से जुड़कर उसे दिल्ली में मजबूत किया। उनके संपादकीय कार्यकाल के दौरान हिन्दी पत्रकारिता में 'संडे नईदुनिया' ने एक खास मुकाम बनाया।

प्रयोगधर्मी और कल्पनाशील विष्णु नागर के मन में सक्रिय पत्रकारिता से हटकर कुछ नया आकाश रचने की छटपटाहट होने लगी थी। उन्होंने आलोक मेहता को अपना इस्तीफा भेज दिया। लंबी बातचीत के बाद बे-मन से मेहताजी ने उनका इस्तीफा मंजूर किया। आखिर कोई भी 'पारस' को अपने से क्यों दूर होने देना चाहेगा?

विचारों का समंदर अपने अंदर समेटे विष्णु नागर ने साहित्य के लिए खाली समय का भरपूर उपयोग किया। हालांकि जल्द ही वे फिर से पत्रकारिता के मैदान में आकर डट गए। वे साप्ताहिक पत्रिका 'शुक्रवार' के संपादक हो गए।

पाठकों की नब्ज को अच्‍छे से समझने वाले विष्णु नागर के संपादकीय कौशल से 'शुक्रवार' जल्द ही पहले से बाजार में मौजूद चोटी की समाचार पत्रिकाओं को टक्कर देने लगी। उनके हाथों की जादुई छुअन से होकर लगातार आ रहे शुक्रवार के साहित्यिक विशेषांक तो संग्रहणीय हैं। देशभर में पाठक शुक्रवार और विशेषांकों को चाव से पढ़ रहे हैं।

पत्रकारिता पर जितनी पकड़ और अधिकार विष्णु नागर की है, उतना ही प्यार उन्हें साहित्य से भी है। उनकी कई कविताओं का अनुवाद अंग्रेजी, जर्मन और रूसी भाषाओं में हो चुका है।

64 वर्ष की उम्र में भी युवा जोश और ऊर्जा से भरे विष्णु नागर का बचपन बड़े कष्ट और के बीच बीता है। कंटकभरे मार्ग पर चलकर ही विष्णु नागर का व्यक्तित्व तपा है। कह सकते हैं कि उसी तप और ताकत से आज भी वे एक युवा की तरह हिन्दी पत्रकारिता और साहित्य दोनों की सेवा कर रहे हैं। (‍मीडिया विमर्श में लोकेंद्र सिंह)



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