नगरीय निकाय चुनाव से भाजपा के मिशन-2023 की तैयारियों पर उठे सवाल?

Author विकास सिंह| Last Updated: गुरुवार, 14 जुलाई 2022 (12:46 IST)
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भोपाल। मध्यप्रदेश में सत्ता के सेमीफाइनल के तौर पर देखे जा रहे नगरीय चुनाव की वोटिंग खत्म होने के बाद अब सबकी निगाहें 17 और 20 जुलाई को होने वाली मतगणना पर टिक गई है, जब के परिणाम आएंगे। पूरे प्रदेश की निगाहें प्रदेश के उन 16 नगर निगमों पर टिकी हुई है जहां पर महापौर पद के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन हुआ। नगर निगमों में कम वोटिंग के बाद ऐसे कयास लगाए जा रहे है कि चुनाव परिणाम काफी चौंकाने वाले हो सकते है। कम वोटिंग का ठीकरा सत्तारूढ पार्टी भाजपा चुनाव आयोग से सिर पर जरूर फोड़ रही हो लेकिन निकाय चुनाव ने पार्टी के उन तमाम दावों पर सवाल उठा दिए है जो वह 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर कर रही है।


मेरा बूथ-सबसे मजबूत’ के दावे पर सवाल-नगरीय निकाय चुनाव के पहले चऱण में भोपाल, इंदौर और ग्वालियर में कम वोटिंग के लिए भाजपा ने मतदाता सूची में गड़बड़ी के साथ बड़ी संख्या में लोगों के मतदान केंद्र बदलने को बताया। पार्टी के इन आरोपों के बाद खुद पार्टी के बूथ अध्यक्ष और कार्यकर्ताओं की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई। सवाल यह उठा कि मतदाताओं के बूथ बदल गए तो बूथ अध्यक्षों ने समय रहते यह बात पार्टी में उचित फोरम पर क्यों नहीं रखी। इसके साथ मतदाता पर्ची घर-घर पहुंचाने का काम पार्टी के बूथ कार्यकर्ता भी करते थे लेकिन अगर मतदाताओं तक पर्ची नहीं पहुंची तो सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या बूथ कार्यकर्ता चुनाव में घर बैठ गए।

2023 विधानसभा चुनाव से पहले हर बूथ को डिजिटल करने का दावा करने वाली भाजपा ने

हर बूथ पर ‘त्रिदेव’ बनाए थे। जिसमें बूथ अध्यक्ष, महामंत्री और बूथ लेवल एजेंट शामिल थे। ऐसे में अगर बूथ तक वोटर नहीं पहुंचा था तो इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा। ‘मेरा बूथ-सबसे मजबूत’ कe नारा देने वाली पार्टी कहां चूक गई अब इसकी समीक्षा करने की तैयारी में पार्टी जुट गई है। ।

पीढ़ी परिवर्तन का खामियाजा-नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा को सबसे अधिक खामियाजा पार्टी में पीढ़ी परिवर्तन के दौर से उठाना पड़ा। चुनाव के दौरान अनुभवी और पुराने कार्यकर्ता घर बैठे गए जिसके कारण पार्टी को काफी नुकसान उठाना पड़ा। भाजपा ने 35 साल से कम उम्र के युवाओं को मंडल और वॉर्डों की जिम्मेदारी सौंपी थी। युवा मंडल अध्यक्षों ने वार्ड से लेकर बूथ तक अपनी अपनी नई टीम बना ली है। जिसमें पुरानी कार्यकर्ता बाहर कर दिए गए है। ऐसे में पार्टी को वह अनुभवी कार्यकर्ता जिनको दर्जनों चुनाव लड़वाने का अनुभव था वह अपने घर बैठ गए। मोहल्ले के रहने वाले बुजुर्ग पार्टी के कार्यकर्ताओं ने चुनाव प्रचार से भी दूरी भी बना ली और और उसका खामियाजा पार्टी के उम्मीदवारों को उठाना पड़ा।
चुनावी मैनेजमेंट पर सवालिया निशान-निकाय चुनाव में भाजपा के चुनावी मैनेजमेंट पर भी सवाल उठे। निकाय चुनाव में फील गुड के फैक्टर में रहने वाले पार्टी के रणनीतिकारों की नींद तब खुली जब पहले चरण में कम वोटिंग हुई। इसके बाद पार्टी के मैनेजरों को याद आया कि 13 जुलाई को गुरुपूर्णिमा है और मतदान की तारीख बदलवाने चुनाव आयोग दौड़ पड़े। हैरत की बात यह है कि चुनाव आयोग ने 1 जून को चुनावी कार्यक्रम घोषित किया था और भाजपा को पहले चरण में कम मतदान होने के बाद 38 दिन बाद याद आया कि 13 जुलाई को जिस दिन दूसरे चरण का मतदान है उस दिन गुरु पूर्णिमा है। इस उदाहरण से भाजपा की चुनावी मैनेजमेंट की सक्रियता उजागर हो गई है।
पन्ना और आधा पन्ना प्रमुख पर भी सवाल-भाजपा को चुनाव दर चुनाव विजयी बनाने में पन्ना और आधा पन्ना प्रमुख की भी बड़ी भूमिका रही है। भाजपा ने जब बूथ को डिजिटल करने के क्रम में बूथ स्तर पर ‘त्रिदेव’ बनाए थे। जिसमें अध्यक्ष, महामंत्री और बूथ लेवल एजेंट के अलावा मतदाता सूची के हर पेज पर एक प्रभारी भी था। मतदाता सूची में गड़बड़ी के बाद पन्ना प्रमुख के नाम से जाने पहचाने वाली इन कार्यकर्ताओं की भूमिका पर भी सवाल उठ गए है। कहा यह भी जा रहा है कि बूथ स्तर के ‘त्रिदेव’ को सूची उपलब्ध ही नहीं कराई गई। प्रदेश कई स्थानों से ऐसी शिकायतों पार्टी नेताओं तक पहुंची है। ऐसे में जब मतदाता सूचियां प्रत्याशियों ने त्रिदेव को नहीं दी तो पार्टी को आखिरी समय तक यह पता नहीं चल सका कि किन लोगों के नाम कट गए हैं य किन के नाम दूसरी जगह जुड़ गए हैं।

जमीन से ज्यादा सोशल मीडिया पर जोर-6 जुलाई को हुए पहले चरण के चुनाव के बाद भाजपा का पूरी चुनावी मैनेजमेंट बैकफुट पर है। बूथ को डिजिटल करने के लिए भाजपा ने जोर-शोर से अभियान चलाया, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इसकी तारीफ भी की लेकिन निकाय चुनाव में कम वोटिंग के बाद इस पर सवाल उठ गए। पार्टी के नेता बूथ डिजिटलाइजेशन के कार्यक्रमों के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर खूब पोस्ट की लेकिन वह जमीनी सियासत से कट गए। चुनाव के दौरान पार्टी प्रत्याशियों को पता चला कि सैकड़ों स्थानों पर इस तरह की समितियां सिर्फ कागज पर है और बूथ अध्यक्ष महामंत्री गायब है।




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