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Written By ND

बस इतना सा ही..!

जीवन के रंगमंच से

भारतीय स्त्री
प्रज्ञा
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भारतीय सदंर्भों में स्त्री अधिकारों की बात करते समय अनेक सवाल हमारे सामने खड़े हो जाते हैं। इनमें वे सवाल शामिल हैं जो आए दिन घटने वाली घटनाओं के रूप में मीडिया के माध्यम से हम तक पहुँचते हैं जैसे कि आए दिन होने वाले बलात्कार से लेकर भ्रूण हत्या और आपराधिक छेड़खानी की घटनाओं तक के समाचार या फिर ऑनर किलिंग के समाचार जहाँ पर खानदान या परिवार की 'इज्जत' की खातिर की जाती हत्याएँ।

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इन सभी से हर संवेदनशील शख्स के मन में यह सवाल उठता है कि क्या भारतीय समाज सभ्य समाज रह गया है? इन सवालों के साथ-साथ बराबरी और भेदभाव के सवाल तो हमेशा से उठते आए हैं। पर उनके जवाब कहाँ हैं? शायद ये जवाब हमारे-आपके भीतर हैं पर जिन पर हमने पुरुषसत्तात्मक समाज में अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए कई पर्दे डाल रखे हैं।

इस संस्कृति को धर्म और सामाजिक नैतिकता का आधार मिला हुआ है। इसलिए जब हम प्राचीन काल से लेकर आज तक के सामाजिक विकास को देखते हैं तो पाते हैं कि धर्म, संस्कृति और सामाजिक-नैतिकता का नाम लेकर वर्चस्ववादी ताकतें स्त्री को उसके सहज मानवीय अधिकारों से वंचित रखती आई हैं। और सच पूछें तो ये स्त्री अधिकार हैं क्या? मात्र एक सम्मान, स्वाभिमान और स्वावलंबन से भरा जीवन जीने की एक आकांक्षा। बस इतना ही।

पर ये इतना ही पाने की इच्छा स्त्री को विद्रोही करार देने के लिए काफी है। बस 'इतने से ही' पाने की ख्वाहिश रखने वाली स्त्री को समाज अपने सामने खड़ा नहीं देख सकता है। दिनोदिन अपने 'इतने से ही' को पाने के लिए हर स्त्री को अपने जीवन में कभी न कभी, कहीं न कहीं संघर्ष करना पड़ता है।

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पिछले दिनों कॉलेज में जेंडर समानता के लिए बनाए गए 'परिवर्तन' ने जन्म के नाटक 'वो बोल उठी' का प्रस्तुतीकरण करवाया। इस नाटक की तीन कहानियाँ सहज मानवीय इच्छाओं का इंद्रधनुष हैं। नाटक से पहले मौजूद लोगों से मैंने यही बात साझा की कि क्या हमेशा की तरह आज भी हम सभी नाटक देखेंगे और मनोरंजन के अन्य माध्यमों की तरह इसका मजा उठाकर आराम से घर जाएँगें।

थोड़ा सा समाज की संवेदनहीनता पर चिंतित होंगे और उसके बाद फिर से लौट जाएँगे अपने उसी पुराने जीवन के ढर्रे पर, जहाँ अपने परिवार की स्त्री एक रिचुअल की तरह देवी है और घर से बाहर की तमाम स्त्रियाँ मात्रा 'ऑब्जैक्ट ऑफ लस्ट' हैं। इसीलिए ये नाटक देखने के बाद जब अपने जीवन में लौटें तो इस संवेदनशीलता के साथ लौटें कि हमारे समाज के सड़े और गले संस्कारों में बहुत कुछ ऐसा है जिसे बदलना चाहिए और उसे हम बदलेंगे और एक ऐसा समाज बनाएँगे जिसमें स्त्री को परिवार और व्यापक समाज में अपने सम्मान, स्वाभिमान और स्वावलंबन की लड़ाई न लड़नी पड़े।
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