प्रभाकर मणि तिवारी
देश में 'गिग वर्करों' की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2021 में जहां यह संख्या करीब 77 लाख थी वहीं इस साल यह बढ़ कर 1.20 करोड़ तक पहुंच गई है और वर्ष 2030 तक यह आंकड़ा 2.35 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। गिग वर्कर्स वे लोग होते हैं जो स्थायी तौर पर कहीं काम करने की बजाय कांट्रैक्ट के आधार पर अस्थायी रूप से काम करते हैं। ऑनलाइन फूड डिलीवरी, क्विक कॉमर्स, राइड शेयरिंग और ई-कामर्स प्लेटफार्म की तादाद बढ़ने के साथ ही ऐसे कामगरों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।
गिग वर्कर्स वे लोग होते हैं जो स्थायी तौर पर कहीं काम करने की बजाय कांट्रैक्ट के आधार पर अस्थायी रूप से काम करते हैं। ऑनलाइन फूड डिलीवरी, क्विक कॉमर्स, राइड शेयरिंग और ई-कामर्स प्लेटफार्म की तादाद बढ़ने के साथ ही ऐसे कामगरों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।
इस समय देश के विभिन्न इलाके कड़ी गर्मी और लू से जूझ रहे हैं, लेकिन ऐसे प्रतिकूल मौसम के बावजूद कर्मचारी रोजाना 12 घंटे या उससे ज्यादा काम करने पर मजबूर हैं। इतनी मेहनत के बावजूद इनको महीने भर में औसतन 25 हजार रुपए की ही कमाई होती है। केंद्र सरकार ने श्रम कानूनों के तहत गिग वर्करों को औपचारिक मान्यता तो दे दी है। लेकिन उनके लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं अब तक हकीकत में नहीं बदल सकी हैं।
काम पर नहीं जाएंगे तो खाएंगे क्या?
ज्यादातर गिग वर्कर काम छिन जाने के डर से अपने असली नाम के साथ बात करने को तैयार नहीं हुए। डीडब्ल्यू से बातचीत में कोलकाता में एक ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफार्म के लिए काम करने वाली अंजलि (बदला हुआ नाम) कहती हैं, "पति के पास कोई स्थायी नौकरी नहीं है। इसलिए मजबूरन मुझे यह काम करना पड़ रहा है। इससे किसी तरह दो जून की रोटी और बच्चों की पढ़ाई का इंतजाम होता है। अगर हम यह काम नहीं करें तो खाएंगे क्या?"
उनका कहना था कि भारी गर्मी या बरसात के बावजूद हमें तय समय के भीतर डिलीवरी करनी होती है। अगर ऑर्डर पहुंचाने में देरी हुई तो ग्राहकों की भी झिड़की सुननी पड़ती है और ऑनलाइन प्लेटफार्म की भी। कई बार हमारे पैसे भी काट लिए जाते हैं। महीने में मुश्किल से दो दिन छुट्टी मिलती है।
एक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के लिए काम करने वाली सुष्मिता (बदला हुआ नाम) डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती है, "कमाई का कोई भरोसा नहीं है। मैंने बीए की डिग्री हासिल की है। लेकिन दूसरी कोई नौकरी नहीं मिली तो चार साल से यही काम कर रही हूं। यह काम करते हुए शादी के बारे में सोचना भी मुश्किल है।"
एक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के लिए काम करने वाले सौरभ (बदला हुआ नाम) डीडब्ल्यू से कहते हैं, "ग्राहक तो सिर्फ यही देखते हैं कि हमारा सामना पहुंचने में देरी क्यों हुई। लेकिन कोलकाता की भारी गर्मी और उमस में हेलमेट पहन कर पीठ पर भारी बस्ता लाद कर समय पर पहुंचना कितना मुश्किल है, यह हम ही समझ सकते हैं।" उन्होंने बताया कि गर्मी के कारण अगर हम कहीं पानी पीने के लिए भी दो मिनट रुक गए तो पचास बातें सुननी पड़ती हैं। इसके अलावा, किसी दिन डिलीवरी कम हुई तो पैसे भी उसी हिसाब से कम मिलते हैं।
गिग वर्करों का कहना है कि जानलेवा गर्मी में रोजाना 12 से 14 घंटे तक मेहनत करने के बावजूद महीने के आखिर में ज्यादा कमाई नहीं हो पाती। पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने कमाई कम कर दी है। उनका कहना है कि फिलहाल मौसम उनका सबसे बड़ा दुश्मन है। भारी गर्मी और बारिश में भी दस मिनट के भीतर आर्डर डिलीवरी करने के भारी दबाव के कारण कई बार हादसे हो जाते हैं। लेकिन इससे बचाव के लिए न तो बीमा की सुविधा है और न ही संबंधित प्लेटफॉर्म से कोई सहायता मिलती है।
दिल्ली में बीते दिनों गिग वर्करों ने 20 रुपए प्रति किलोमीटर की दर तय करने की मांग में हड़ताल भी की थी। वैसे, इससे पहले भी यह लोग देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी विभिन्न मांगों के समर्थन में हड़ताल करते रहे हैं। लेकिन उनकी आर्थिक या सामाजिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। असंगठित क्षेत्र में होने के कारण इन लोगों को निश्चित वेतन, दुर्घटना बीमा और सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता है। आईआईटी, दिल्ली के हालिया अध्ययन से भी इसकी पुष्टि होती है।
गिग वर्करों पर आईआईटी दिल्ली की स्टडी
आईआईटी दिल्ली ने अपनी ताजा स्टडी रिपोर्ट में कहा है कि भारी गर्मी में रोजाना 12 घंटे से ज्यादा काम करने के बावजूद गिग वर्करों को कोई खास लाभ नहीं मिल रहा है। प्रतिकूल मौसम में लंबे समय तक काम करने के कारण ज्यादातर लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से भी जूझ रहे हैं। अध्ययन के मुताबिक, करीब 56 प्रतिशत गिग वर्कर 12 घंटे से ज्यादा काम करते हैं। संस्थान के ट्रांसपोर्टेशन रिसर्च एंड इंजुरी प्रिवेंशन सेंटर (ट्रिप) की शोधकर्ताओं की टीम ने दो चरणों में सैकड़ों गिग वर्करों से बात कर अपनी रिपोर्ट तैयार की है। इससे गिग अर्थव्यवस्था के चमकदार माडल के पीछे छिपी बदहाल तस्वीर का पता चलता है।
रिपोर्ट में गिग वर्कर्स को आउटडोर वर्कर्स की श्रेणी में रखने, उनके काम के घंटे तय करने और गर्मी से बचाव के उपाय करने की सिफारिश की गई है।
हाल ही में गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन ने भी दिल्ली सरकार से कहा है कि 40 से 45 डिग्री तापमान और उमस के कारण उनका काम बड़ी चुनौती बना हुआ है। डिलीवरी राइडर्स और बाकी ऐप बेस्ड कर्मचारियों ने दोपहर 12 बजे से तीन बजे के बीच ब्रेक देने, आराम करने के लिए शेड वाली जगह बने, पीने का पानी का इंतजाम करने और आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने की मांग की है।
वर्करों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की मांग
गिग वर्कर्स के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक ठोस पहल करते हुए कर्नाटक सरकार ने देश का पहला समर्पित डिजिटल शिकायत निवारण तंत्र शुरू किया है। इस कदम से गिग वर्कर के तौर पर काम करने वाले लाखों लोगों को औपचारिक सहायता मिलने की उम्मीद है। इसमें राइड-शेयरिंग, फूड डिलीवरी और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े कामगरों की समस्याओं को ध्यान में रखा गया है। राजस्थान सरकार ने भी गिग वर्कर कल्याण अधिनियम पारित किया है। हरियाणा सरकार भी इस पर विचार कर रही है।
लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि महज एकाध राज्यों में ऐसी पहल से तस्वीर में कोई खास बदलाव आने की उम्मीद नहीं है। इसके लिए केंद्र सरकार को ठोस कदम उठाते हुए राज्यों और गिग वर्करों की यूनियन से बातचीत कर कानूनी प्रावधान बनाने होंगे।
कई साल गिग वर्कर के तौर पर काम कर चुकी सिलीगुड़ी की मानवाधिकार कार्यकर्ता मौमिता साहा डीडब्ल्यू से कहती हैं। "गिग वर्करों का जीवन आसान बनाने के लिए तैयार होने वाले किसी भी कानून में मानवीय पहलुओं का भी ध्यान रखना होगा। सरकार को यह सोचना होगा कि ऐसे लोग भी इंसान हैं और प्रतिकूल मौसम में उनको भी आराम की जरूरत है। उनके लिए दुर्घटना बीमा और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं अनिवार्य करना समय की मांग है।"