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Written By DW
Last Updated :वॉशिंगटन/इस्लामाबाद , शुक्रवार, 29 मई 2026 (11:35 IST)

पाकिस्तान की दुविधा: अब्राहम अकॉर्ड्स से जुड़े या दूर रहे?

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि पाकिस्तान और कुछ अन्य मुस्लिम बहुल देश इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करें। अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने से पाकिस्तान को कुछ फायदे मिल सकते हैं, लेकिन इसके कई बड

Trump Munir
-शामिल शम्स
Abraham Accords : अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नई मांग के बाद पाकिस्तान मुश्किल स्थिति में फंस गया है। ट्रंप ने कहा है कि ईरान युद्ध खत्म करने के लिए होने वाले किसी भी समझौते में पाकिस्तान को इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने वाले तथाकथित 'अब्राहम अकॉर्ड्स' पर हस्ताक्षर करने चाहिए। ट्रंप ने सोमवार को कहा कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और कतर जैसे देशों को भी अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बनना चाहिए। इस समझौते की शुरुआत साल 2020 में डॉनल्ड ट्रंप के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान हुई थी।
 
सोशल मीडिया पोस्ट में ट्रंप ने लिखा, "अमेरिका ने इस जटिल मुद्दे को सुलझाने के लिए जो मेहनत की है, उसके बाद कम से कम इन सभी देशों को एक साथ अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा होना चाहिए।' उन्होंने जिन देशों का नाम लिया उनमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (जो पहले से सदस्य है), कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन (जो पहले से सदस्य है) शामिल हैं। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि सऊदी अरब और कतर को तुरंत इस समझौते पर हस्ताक्षर करने चाहिए। बाकी देशों को भी उनका अनुसरण करना है।
 
अब्राहम अकॉर्ड्स अमेरिका की मध्यस्थता में हुए कई समझौतों की श्रृंखला है। इसका उद्देश्य इजराइल और अरब देशों के बीच आर्थिक और राजनयिक रिश्तों को सामान्य बनाना है। इसके तहत पहला समझौता 15 सितंबर 2020 को इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के बीच हुआ था।
 

फायदे और नुकसान पर विचार

कुछ पाकिस्तानी अधिकारियों ने इस मांग को खारिज कर दिया है। लेकिन अब तक सरकार या सेना की ओर से इस पर कोई साफ और एकजुट प्रतिक्रिया नहीं आई है। इस बीच, पाकिस्तान ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच चल रहे संघर्ष को खत्म कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। अप्रैल में उसने अमेरिका को 28 फरवरी से शुरू हुए ईरान पर हमलों को रोकने के लिए राजी कर लिया था।
 
पाकिस्तान अब भी युद्ध खत्म कराने की कोशिश कर रहा है। मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति कई बार पाकिस्तान की तारीफ कर चुके हैं। उन्होंने देश के सेना प्रमुख आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को अपने 'पसंदीदा' लोगों में भी बताया। ट्रंप से बढ़ती नजदीकी की वजह से इस समय पाकिस्तान की वैश्विक अहमियत बढ़ी है। लेकिन ईरान युद्ध में मध्यस्थता करने की तुलना में अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होना पाकिस्तान के लिए कहीं ज्यादा मुश्किल होगा।
 
राजनीतिक विश्लेषक रजा रूमी ने डीडब्ल्यू से कहा, "अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने के फायदे जरूर हैं। लेकिन राजनीतिक तौर पर इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है। पाकिस्तान को वॉशिंगटन और कुछ खाड़ी देशों से कूटनीतिक समर्थन मिल जाएगा। साथ ही आर्थिक और तकनीकी अवसर भी खुल सकते हैं।" हालांकि, रूमी ने चेतावनी दी कि इस कदम से पाकिस्तान को बड़े खतरे भी हो सकते हैं। वह कहते हैं, "इससे फिलिस्तीन मुद्दे पर पाकिस्तान की स्थिति कमजोर पड़ सकती है, ईरान के साथ तनाव बढ़ सकता है और देश के अंदर अस्थिरता भी बढ़ने की संभावना है।"
 
पाकिस्तान इजराइल को आधिकारिक तौर पर नहीं मानता और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध भी नहीं हैं। हालांकि, पहले दोनों पक्षों के बीच कुछ अनौपचारिक संपर्कों की खबरें सामने आ चुकी हैं। रूमी बताते हैं, "जब तक फिलिस्तीन को अलग देश का दर्जा देने की दिशा में ठोस प्रगति नहीं होती, तब तक इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करना रणनीतिक फैसला कम और दबाव में झुकने जैसा ज्यादा लगेगा। फिलहाल इसके नुकसान, फायदों से ज्यादा दिखाई देते हैं।”
 

सऊदी अरब का फैसला होगा अहम

पाकिस्तान का अब्राहम समझौते में शामिल होना या न होना इस बात पर निर्भर करेगा कि सऊदी अरब इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है। इस्लामाबाद और रियाद के बीच मजबूत कूटनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध हैं। साथ ही इस्लाम के सबसे पवित्र स्थलों के संरक्षक के रूप में सऊदी अरब को अधिकांश पाकिस्तानी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। रूमी के अनुसार, "अगर सऊदी अरब पहले कदम उठाता है, तो पाकिस्तान के लिए इस मुद्दे पर बात करना आसान हो जाएगा। लेकिन यह उतना सरल भी नहीं होगा। इस्लामाबाद रियाद के फैसले का इस्तेमाल खुद को ढकने के लिए कर सकता है। पाकिस्तान अक्सर मध्य पूर्व से जुड़े फैसले सऊदी अरब और खाड़ी देशों के रुख को देखकर लेता है।"
 
विश्लेषक का मानना ​​है कि पाकिस्तान के लिए यह कदम अभी भी जटिल होगा। रूमी बताते हैं, "पाकिस्तान कोई अरब राजशाही नहीं है। यहां की घरेलू राजनीति, धार्मिक दल, मीडिया और फिलिस्तीन के प्रति लोगों का भावनात्मक जुड़ाव इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने को कहीं ज्यादा मुश्किल बना देता है। सऊदी अरब का पहला कदम रास्ता खोल सकता है। लेकिन इससे पाकिस्तान के लिए फैसला लेना आसान नहीं हो जाता।"
 
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे ट्रंप के सहयोगी देश इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने की दिशा में बढ़ते भी हैं, तो यह तुरंत नहीं होगा। इसके साथ कई शर्तें जुड़ी होंगी। अंतरराष्ट्रीय मामलों की विशेषज्ञ और अमेरिका व संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत मलीहा लोधी ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि पाकिस्तान इस पर तभी विचार कर सकता है, जब एक स्वतंत्र व संयुक्त फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना हो और यरुशलम उसकी राजधानी बने। वह आगे कहती हैं, "यह पाकिस्तान का स्पष्ट रुख है और उसका फैसला किसी दूसरे देश के कदम पर आधारित नहीं होगा।"
 
6 दिसंबर 2017 को डॉनल्ड ट्रंप ने आधिकारिक तौर पर यरुशलम को इजराइल की राजधानी के रूप में माना था और अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से यरुशलम ले जाने की घोषणा की थी।
 

आसान नहीं होगा समाधान

ट्रंप का विरोध करना पाकिस्तान के लिए महंगा पड़ सकता है। पाकिस्तान के अमेरिका के साथ गहरे आर्थिक और सैन्य संबंध हैं जो उसे अपने पडोसी और प्रतिद्वंद्वी देश भारत के साथ भू-रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं। अमेरिका पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा निर्यात बाजार भी है। इससे उसकी कमजोर अर्थव्यवस्था को विदेशी मुद्रा मिलती है। पाकिस्तान यह भी जानता है कि आईएमएफ जैसी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं पर वॉशिंगटन का काफी प्रभाव है।
 
 
ईरान युद्ध की वजह से पाकिस्तान की ऊर्जा सप्लाई प्रभावित हुई है। इसके शुरू होने के बाद से ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। पाकिस्तान के लिए जरूरी है कि यह युद्ध जल्द खत्म हो जाए। लेकिन ईरान युद्ध के साथ ट्रंप की अब्राहम अकॉर्ड्स वाली मांग ने पाकिस्तान को ऐसी मुश्किल स्थिति में डाल दिया है, जहां से निकलना मुश्किल होगा। रूमी के मुताबिक पाकिस्तान की सरकार जानती है कि अगर इजराइल के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश की गई, तो देश में इसका भारी विरोध हो सकता है। वह कहते हैं, "धार्मिक पार्टियां, इस्लामी संगठन, दक्षिणपंथी मीडिया और मुख्यधारा के कई राजनीतिक नेता इजराइल को मान्यता देने के फैसले को फिलिस्तीन और पाकिस्तान की विचारधारा के साथ विश्वासघात बताएंगे।"
 
वह आगे जोड़ते हैं, "यदि कोई भी सरकार ऐसा कदम उठाती है, तो देश में प्रदर्शन, संसद में आलोचना, धार्मिक नेताओं की तरफ से विरोध और सरकार पर अमेरिका या खाड़ी देशों के दबाव में काम करने के आरोप लग सकते हैं। गाजा युद्ध के बाद लोगों का गुस्सा और बढ़ गया है।"
 
पाकिस्तान अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल हो या नहीं, इस मुद्दे पर लिया गया उसका फैसला देश की भविष्य की दिशा तय करने वाला साबित होगा।
 
इस रिपोर्ट में डीडब्ल्यू के इस्लामाबाद संवाददाता हारुन जंजुआ ने भी योगदान दिया है।
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