जर्मनी की सूखती नदियों का समाधान क्या होगा
निखिल रंजन
जर्मनी में गर्मियों की वजह से नदियां सूख रही हैं और सरकार के मंत्री इस सोच में डूबे हुए हैं कि जलमार्गों को फिर से डिजाइन किया जाए या फिर नदियों को प्राकृतिक अवस्था में वापस ले जाया जाए। ALSO READ: मानसून का बदलता पैटर्न बढ़ा रहा भारत का जलवायु संकट
गर्मी के मौसम में राइन, डेन्यूब, एल्बे और दूसरी नदियों से गायब होते पानी के कारण इन नदियों के कई हिस्सों में सिर्फ रेत और पत्थर नजर आ रहे हैं। इसकी वजह से माल ढुलाई पर काफी बुरा असर पड़ा है। कई उद्योगों के लिए नदियों के रास्ते से माल की ढुलाई उनकी जीवनरेखा है।
जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मियों के रिकॉर्ड टूट रहे हैं। यूरोप और दूसरे इलाकों में गर्मियों का मौसम भी लंबा हो गया है। वैज्ञानकों ने चेतावनी दी है कि जो समस्या यूरोप अभी झेल रहा हैवह आने वाले वर्षों में और ज्यादा बढ़ेगी। ALSO READ: जलवायु परिवर्तन का संकट झेलने लगा यूरोप
जलमार्गों को गहरा करने पर विचार
जर्मनी के परिवहन मंत्री श्टेफेन बिल्गर ने हाल ही में संकट को देखते हुए एक बैठक बुलाई थी। जिसमें शिपिंग, पोर्ट और माल ढुलाई के ऑपरेटरों से उनकी समस्याएं और उसके असर पर चर्चा की गई। फिलहाल कम समय के लिए जो सबसे पहला समाधान निकाला गया वह है रविवार और छुट्टी के दिनों में सड़कों से ट्रकों के जरिए माल ढुलाई पर लगी रोक को हटाना।
बिल्गर के मुताबिक दीर्घकालीन उपायों में जलमार्गों को गहरा करने और नए तरह के कम गहराई वाले जहाज विकसित करने होंगे। बिल्गर ने राज्यों के परिवहन मंत्रियों से बुधवार को बातचीत के बाद कहा, "हमें हमारे जलमार्गों को ज्यादा कुशल बनाने के साथ ही ऐसे जहाज भी बनाने होंगे जो कम पानी में भी चल सकें।"
इसी दिन बर्लिन में पर्यावरण मंत्री कार्स्टेन श्नाइडर ने संकट का एक अलग समाधान बताया जिसमें नदियों को उनके प्राकृतिक रूप में दोबारा बहाल किया जाना है। पिछले 100 सालों में चले अभियान के बाद कारोबारी इस्तेमाल के लिए नदियों को एक अलग ढांचे में ढाल दिया गया है। श्नाइडर ने अनुरोध किया है, "प्राकृतिक नदियों की ओर जाना होगा जिनकी घुमावदार धाराएं हों और बाढ़ से प्रभावित इलाके होंगे जो नदियों का पानी लंबे समय तक रखेंगे।" ALSO READ: शार्क बता रही है तूफानों का पता
सोच में बदलाव
श्नाइडर का कहना है, "पिछली सदियों में जर्मनी पानी के मामले में समृद्ध देश था। नदियों को हमारे इस्तेमाल के लिए सुदृढ़ बनाने के लिए बड़ी कोशिशें की गईं ताकि हम उन्हें इस्तेमाल कर सकें लेकिन इसके साथ ही नम भूमि को सुखा कर उन्हें खेती के लायक बनाया गया।"
श्नाइडर की दलील है कि जलवायु परिवर्तन ने पानी को ऐसा संसाधन बना दिया है जिसकी कमी है, इसके समाधान के लिए सोच को बदलने की जरूरत है। श्नाइडर की बातों में पर्यावरण समूहों की आवाज सुनाई दे रही है। ये समूह जलमार्गों की गहराई बढ़ाने का विरोध करते हैं।
वर्ल्डवाइल्डफंड यानी डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के बियाट्रिस क्लाउस का कहना है, "उनसे फायदे की बजाय ज्यादा नुकसान होता है। विस्तार देने और सुदृढ़ करने से पानी तेजी से निकल कर नॉर्थ सी और बाल्टिक सागर में पहुंच जाता है, बजाय इसके कि नदियों के आसपास के इलाके उन्हें रोक सकें।" ALSO READ: पृथ्वी पर ऑक्सीजन की उत्पत्ति की पहेली थोड़ी और सुलझी
स्थाई समाधान की जरूरत
आलोचकों की दलील है कि जलमार्गों की गहराई बढ़ाना कोई स्थाई समाधान नहीं है, क्योंकि नदियां इन रास्तों को लगातार पत्थरों और रेत की तलछटों से भरती रहती हैं। पर्यावरणवादी यह भी कहते हैं कि नदियों के किनारों को बांध कर पक्का कर देने से छिछले इलाके खत्म हो जाते हैं जिनमें जलीय जीव और कीट प्रजनन करते हैं। इसके साथ ही उनसे जुड़े बाढ़ के मैदान भी नहीं बचते जो अगर हों तो अतिरिक्त जल को स्पंज की तरह सोख लेते हैं।
फिलहाल के लिए तो ज्यादातर जर्मन राज्यों ने रविवार को ट्रक से माल ढुलाई पर लगे प्रतिबंध को हटा लिया है। ट्रकों से ढुलाई का पर्यावरण पर बोझ जहाजों से ढुलाई की तुलना में बहुत ज्यादा है।
हालांकि जर्मन इकोनॉमिक इंस्टिट्यूट के थॉमस पुल्स का कहना है कि उन्हें ट्रकों से ढुलाई का ज्यादा फायदा होने की उम्मीद नहीं है। जर्मन पत्रिका डेयर श्पीगल से बातचीत में उन्होंने कहा कि नदियों में चलने वाले एक जहाज के बराबर ढुलाई के लिए कम से कम 150 ट्रक की जरूरत पड़ती है।
विपक्षी दल ग्रीन पार्टी के प्रमुख फेल्किस बानास्चाक ने चांसलर मैर्त्स के नेतृत्व वाली सरकार पर जलवायु की समस्या की मूल वजह को खत्म करने के लिए कोशिश नहीं करने की आलोचना की है। बानास्चाक ने एक अखबार से कहा है, "नदियां सूख रही हैं, जहाज चल नहीं पा रहे और परिवहन मंत्री शिपिंग चैनल को और गहरा करने और अलग तरह के जहाजों के अलावा और कोई उपाय नहीं कर रहे।"
बानास्चाक ने यह भी कहा, "यह इस सरकार का चरित्र है कि सब बातों पर चर्चा होगी सिवाय जलवायु संरक्षण के... मूल समस्या से निपटने की बजाय सरकार लगातार गहरे होते जख्मों पर बैंड-एड लगा रही है।"

