राजनीति में लंबी कूद के माहिर चंद्रबाबू

पुनः संशोधित मंगलवार, 9 अप्रैल 2019 (12:18 IST)
"मोदी हटाओ, देश बचाओ" के नारे को ताकत देने वाले चंद्रबाबू नायडू भारतीय राजनीति के चतुर रणनीतिकार हैं। 2019 के चुनावों में वह तुरुप के पत्ते अपने हाथ में रखना चाहते हैं।

की तेलुगु देसम पार्टी यानी टीडीपी का भारत की समकालीन राजनीति में वही केंद्रीय महत्त्व है जो तमिलनाडु की डीएमके एआईएडीएमके, यूपी की एसपी बीएसपी, महाराष्ट्र की एनसीपी और बंगाल की टीएमसी का रहा है। और टीडीपी को इस मुकाम पर पहुंचाने वाले नेता हैं पार्टी के अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू- जिन्हें आज देश की सत्ता राजनीति में 'किंगमेकर' भी कहा जाए तो गलत न होगा।

गठबंधन सरकारों के दौर में टीडीपी एक महत्त्वपूर्ण कड़ी बनी रही है। बीजेपी की अगुवाई वाला एनडीए गठबंधन हो या कांग्रेस की अगुवाई वाला यूपीए गठबंधन, टीडीपी की आवाजाही और पहुंच दोनों में रही है। 37 साल पुरानी पार्टी, एनटीआर की विरासत से पल्लवित हुई है और उनके बाद चंद्रबाबू नायडू के प्रताप और विलक्षण संगठनात्मक कौशल की बदौलत फलती फूलती रही है। 2018 में चंद्रबाबू ने राजनीति में अपने चार दशक पूरे किए। 27 साल की उम्र के थे, जब 1978 में वो चुनाव जीतकर अविभाजित आंध्र प्रदेश की विधानसभा में दाखिल हुए थे। सरकार कांग्रेस की थी और वो उसमें सिनेमैटोग्राफी मिनिस्टर बनाए गए थे। सबसे कम उम्र वाले मंत्री का रिकॉर्ड उनके नाम है।

राजनीति में सफलता और तरक्की की सीढ़ियां चढ़ने में लंबे कद के चंद्रबाबू ने देर नहीं की, लंबे डग, लंबे हाथ और दूरदृष्टि उनके काम आई। अपने दौर के प्रखर राजनीतिज्ञ और लोकप्रिय फिल्म अभिनेता एनटी रामाराव (एनटीआर) की बेटी के साथ उनका विवाह हुआ, एनटीआर ने टीडीपी का गठन किया तो चंद्रबाबू उनके दामाद ही नहीं बल्कि उत्तराधिकारी के रूप में उनके बगलगीर थे। मध्यवर्गीय परिवार और सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि वाले और गॉडफादर रहित चंद्रबाबू का आंध्र की सत्ता राजनीति के शीर्ष पर पहुंच जाना, चमत्कार ही था। लेकिन इसमें किसी दैवीय नहीं, बल्कि चंद्रबाबू की सत्ता राजनीति की ऊंच नीच को सूंघने के जबरदस्त 'कौशल' का हाथ था।

चंद्रबाबू के नाम आंध्र की राजनीति के हवाले से कई रिकॉर्ड हैं। राज्य में चार दशक की राजनीतिक सक्रियता के अलावा सबसे अधिक लंबी अवधि तक मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का कमाल भी उनके नाम दर्ज है। 1995-2004 तक। और 2004 से 2014 के दौरान वो भला कहां थे? वहीं थे, विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में सबसे लंबी अवधि का रिकॉर्ड बनाते हुए। एक बार फिर मुख्यमंत्री के रूप में 2014-2019 का ताजा कार्यकाल उनके पास है और एक बार फिर चंद्रबाबू नायडू अपने रिकॉर्ड को सुधारने की जीतोड़ मेहनत में जुटे हैं। जैसे बंगाल की राजनीति से ममता बनर्जी ने वाम दलों को किनारे धकेल दिया उसी तरह आंध्र में नायडू ने कांग्रेस के वर्चस्व और एकछत्र शासन को खत्म किया है। ये बात अलग है कि आज आंध्र में उसी कांग्रेस के साथ की उन्हें जरूरत पड़ रही है। लेकिन एक दौर में गैर कांग्रेसी राजनीति के वो प्रखर और निर्विवाद धुरी बन चुके थे। और एचडी देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल जैसे गैर कांग्रेसी नेताओं को प्रधानमंत्री बनवाने में उनका योगदान अग्रणी था।

नायडू की लोकप्रियता और मुख्यमंत्री के रूप में असंदिग्ध सफलताओं के पीछे एक बड़ी वजह उद्योग जगत के साथ उनकी अटूट मित्रता और किसानों के प्रति उनकी व्यवहारिक संवेदनशीलता रही है। हैदराबाद को आईटी हब बनाकर साइबराबाद का नाम देने वाले, मुख्यमंत्री पद में औद्योगिक तत्परता और कॉरपोरेटी मिजाज के गुणों को विलीन कर सीईओ-सीएम कहलाने वाले चंद्रबाबू नायडू अपनी नेतृत्व क्षमताओं और चतुर रणनीतियों के दम पर अपना सिक्का मनवाते आए हैं। उनके आलोचक हालांकि कहते हैं कि नायडू एक चालाक राजनीतिक खिलाड़ी हैं, मौकापरस्ती उनकी पहचान है, जोड़तोड़ की राजनीति के माहिर हैं और राजनीतिक स्वार्थ उनमें कूटकूट कर भरा हुआ है।

नायडू पार्टी के खेवनहार भी माने जाते हैं। एनटीआर के दुलारे वो ऐसे ही नहीं बने। 1984 में जब एन भास्कर राव ने तख्ता पलट कर, कांग्रेस की मदद से एनटीआर को सत्ता से हटवा दिया तो नायडू ही थे जिन्होंने अपने ससुर को कुछ सहारों के साथ वापस सत्ता पर बैठाया, गैर कांग्रेसी विपक्षी दलों की मदद से उन्होंने ये मुमकिन कर दिखाया। दूसरी बार नायडू ने तो और बड़ा कमाल किया। एनटीआर की दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती के साथ वर्चस्व की लड़ाई होने लगी तो उन्होंने अपने ससुर के खिलाफ ही एक तरह से बगावत कर दी। लेकिन सत्ता का हस्तांतरण उनकी ओर सहजता से हो गया जब 1999 के चुनावों में उनकी वापसी हुई।

टीडीपी के अस्तित्व पर बड़ा संकट, तेलंगाना राज्य आंदोलन के दौरान भी आया। तेलुगु आत्मगौरव के सम्मान के नारे के साथ अस्तित्व और बाद में सत्ता में आई पार्टी, तेलंगाना, रायलसीमा और तटीय आंध्र जैसे इलाकों में अपनी पुरानी एनटीआरवादी राजनीतिक कुशलता को बना कर नहीं रख पाई। ये इलाके उससे छूटते गए। पार्टी के ही तत्कालीन नेता के चंद्रशेखर राव ने तेलंगाना राज्य के लिए आंदोलन चला दिया और टीडीपी आंध्र की पार्टी के रूप में सिमट गई। 2014 में जब तेलंगाना अलग हुआ तो किसी तरह विभाजन के खिलाफ भावनात्मक ज्वार को भुनाते हुए नायडू की पार्टी सत्ता में लौट पाई।

44 साल की उम्र मे उन्होंने एनटीआर से पार्टी की कमान संभाली थी। 2014 में चुनाव के दौरान उन्होंने 2300 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर राज्य का गांव गांव नाप दिया जिसका उन्हें फायदा भी मिला और आज जब वो 67 साल के हो रहे हैं तो बताया जाता है कि 18-18 घंटे काम करते हैं। उन पर वर्कोल्हिक यानी काम का झक्की होने का ठप्पा मिटा नहीं है। टीएमसी या बीएसपी या एआईएडीएमके में उत्तराधिकार के जो संकट रहे हैं, टीडीपी में वैसा न हो, ये भी चंद्रबाबू नायडू सुनिश्चित कर चुके हैं। परिवारवादी राजनीति के तहत ही नायडू अपने बेटे को राजनीति में उतार चुके हैं। अपने पिता की कैबिनेट में पुत्र के पास आईटी, ग्राम्य विकास और पंचायती राज जैसे तीन अहम मंत्रालय हैं।

1999 में गठबंधन राजनीति की अहम धुरी बनकर चंद्रबाबू नायडू की पार्टी ने केंद्र में एनडीए सरकार के साथ शिरकत की। 2014 में भी वो एनडीए के साथ बने रहे। लेकिन पिछले साल वो एनडीए और मोदी सरकार के रवैये से कथित रूप से आहत और रुष्ट होकर अलग हो गए। राज्य स्तर पर कांग्रेस के साथ गठजोड़ की उनकी सैद्धांतिक सहमति बनी है और गैरएनडीए विपक्षी दलों के गठबंधन में वो अहम किरदार के रूप में सक्रिय हो चुके हैं। मोदी हटाओ, देश बचाओ का नारा देने वालों में चंद्रबाबू नायडू की आवाज भी प्रमुखता से शामिल है। अगर क्षेत्रीय राजनीति में वर्चस्व की लड़ाइयों को देखें तो ऐसा भी नहीं है कि आंध्र प्रदेश में अकेले सर्वमान्य और सबसे लोकप्रिय नेता नायडू हैं। तेलंगाना बनने से पहले टीएस चंद्रशेखर राव और असदउद्दीन औवेसी उनके सामने थे और आज की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उनके सामने हैं- वाईएसआर कांग्रेस के 46 साल के तेजतर्रार नेता जगन रेड्डी, जो विधानसभा में विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत वाईएस राजशेखर रेड्डी के सुपुत्र हैं।

20 अप्रैल 1950 को आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में पैदा हुए चंद्रबाबू नायडू को इंडिया टुडे पत्रिका के एक पोल में सहस्त्राब्दी के आईटी इंडियन का खिताब मिल चुका है। युवा पत्रकार तेजस्विनी पगाडला ने उनकी बायोग्राफी लिखी है। पिछले साल जनवरी में आई इस किताब का नाम हैः इंडियाज ग्लोकल लीडरः चंद्रबाबू नायडू।



 

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