आंद्रेयास बेकर | निकोलस मार्टिन
जर्मनी के पश्चिमी पहाड़ी इलाके में स्थित न्यूर्बुर्गरिंग दुनिया का सबसे लंबा स्थायी रेस ट्रैक है। यह लगभग एक सदी पुराना है और यहां फॉर्मूला वन ग्रैंड प्रिक्स की कई रेसें आयोजित की जा चुकी हैं। इस ट्रैक के मुख्य हिस्से को नॉर्डश्लाइफे' या नॉर्दर्न लूप' कहा जाता है। 20.8 किलोमीटर लंबे इस ट्रैक को ग्रीन हेल' के नाम से भी जाना जाता है। इसकी वजह है कि यह आइफेल क्षेत्र के घने जंगलों से घिरा हुआ है और इसकी बनावट बहुत ही खतरनाक और थका देने वाली है।
कार रेसर और इन्फ्लुएंसर मिशा शारुडिन बताते हैं कि जर्मन कार बनाने में इंजीनियरिंग और परफॉर्मेंस की अहमियत को समझने के लिए नॉर्डश्लाइफे एक अच्छी जगह है। उन्होंने 190 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से एक मोड़ से गुजरते हुए कहा, "अगर कोई कार यहां अच्छा लैप टाइम निकाल पाती है, तो इसका मतलब है कि उसके सभी पार्ट्स काम करते हैं: सस्पेंशन, टायर, इंजन, चेसिस, और बेशक ड्राइवर भी। यह रोलर कोस्टर से बेहतर है।”
रेस ट्रैक पर टेस्टिंग
मिशा कहते हैं कि सभी बड़ी कार कंपनियों के न्यूर्बुर्गरिंग में टेस्ट सेंटर हैं। असल में, 1927 में रेस ट्रैक बनाने का एक अहम कारण कारों की टेस्टिंग भी था। जर्मन कार कंपनियों ने अपनी इस विरासत और बिना स्पीड लिमिट वाले 'ऑटोबान' हाईवे का फायदा उठाया है। उन्होंने इन दोनों चीजों को अपनी मार्केटिंग का हिस्सा बनाकर दुनिया भर में अपने ब्रैंड को मजबूती से स्थापित किया है।
मर्सिडीज-बेंज, बीएमडब्ल्यू, ऑडी और फोक्सवागन जैसे ब्रैंड अपनी बेहतरीन इंजीनियरिंग, शानदार परफॉरमेंस और भरोसे के लिए जाने जाते थे। ये सिर्फ कारें नहीं थीं, बल्कि ये सांस्कृतिक पहचान थीं और जर्मनी की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी थीं। लेकिन आज वह जादू खत्म हो रहा है।
खत्म हो रहे हैं जर्मन ऑटो उद्योग के अच्छे दिन
जर्मनी के ऑटो उद्योग में 10 लाख से ज्यादा लोग काम करते हैं। इसे लंबे समय से आर्थिक स्थिति मापने का पैमाना माना जाता रहा है। 1950 में, जर्मन कार निर्माताओं ने लगभग 2 लाख गाड़ियां बेची थीं। आज वे दुनिया भर में करीब 1.4 करोड़ गाड़ियां बेचते हैं। दशकों तक उनका फॉर्मूला सीधा था: वर्ल्ड-क्लास इंजीनियरिंग और दुनिया भर में मांग, यानी बड़ी सफलता।
हालांकि, अब अच्छे दिन खत्म हो रहे हैं। बिक्री कम हो रही है, नौकरियां जा रही हैं और फैक्ट्रियां बंद होने की कगार पर हैं। मर्सिडीज के एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "दबाव बढ़ रहा है। लागत बचाने पर बहुत ज्यादा जोर दिया जा रहा है। हर जगह सिर्फ लागत में कटौती की बात हो रही है।”
जर्मन कार उद्योग की चमक 2015 में तब फीकी पड़ने लगी जब 'डीजलगेट' कांड सामने आया। फोक्सवागन को उत्सर्जन परीक्षणों में धोखाधड़ी करते हुए पकड़ा गया था। इसकी वजह से कंपनी को 30 अरब यूरो से अधिक का नुकसान तो हुआ ही, जर्मन ब्रांडों पर से लोगों का भरोसा टूट गया। इससे भी बुरा यह हुआ कि उसी समय दुनिया भर में पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों की ओर झुकाव बढ़ रहा था। लेकिन इस दौरान जहां टेस्ला अपनी इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री दोगुनी कर रहा था, वहीं जर्मन कार निर्माता हिचकिचा रहे थे।
चीन: गोल्डेन एज से लेकर जमीन खिसकने तक
कई वर्षों तक चीन, जर्मन कंपनियों के लिए सपनों की धरती' बना रहा। 1980 के दशक में, चीन के राजनैतिक नेताओं ने फोक्सवागन (जिसका जर्मन में अर्थ है जनता की कार') को जॉइंट वेंचर बनाने और चीन के लोगों के लिए चीन में ही कारें बनाने का न्योता दिया था। एक समय ऐसा भी था जब चीन के कार बाजार के लगभग 50 फीसदी हिस्से पर अकेले फोक्सवागन का कब्जा था।
बाद में, दूसरी कार कंपनियों ने भी ऐसा ही किया। जैसे-जैसे चीन की अर्थव्यवस्था बढ़ी, देश का कार बाजार भी बड़ा होता गया। कुछ साल पहले तक, जर्मनी की कार बनाने वाली कंपनियां चीन में हर तीसरी कार बेचती थीं।
बीएट्रिक्स काइम ने चीन में फोक्सवागन के साथ दो दशकों तक काम किया है। अब वे ड्यूसबर्ग में एक इंडस्ट्री कंसल्टेंसी सीएआर' में डायरेक्टर हैं। उन्होंने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा, "वह दौर सोने की खदान खोदने जैसा था। हम ढेर सारी कारें बेच रहे थे और खूब पैसा कमा रहे थे। उस समय मुकाबले में चीनी कंपनियां न के बराबर थीं।”
जर्मन ऑटोमेकर्स को पीछे छोड़ने के लिए चीन को मिला मौका
हालांकि, चीन की एक सोची-समझी योजना थी: पहले विदेशी भागीदारों से सीखो और फिर खुद आगे बढ़ो। 2009 में, बीजिंग ने इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए कानून पारित किया। केम ने समझाया, "यह असल में जलवायु परिवर्तन की वजह से नहीं था, बल्कि चीन एक ऐसी तकनीक तलाश रहा था जहां वह विदेशियों को पीछे छोड़ सके और खुद तरक्की कर सके।”
वह आगे बताती हैं, "जर्मन कार निर्माताओं ने यह सोचा भी नहीं था। उन्होंने चीनी नेतृत्व के पक्के इरादे और विकास की रफ्तार को कम करके आंका था।”
अरबों रुपये की सब्सिडी और बुनियादी ढांचे पर भारी निवेश के बाद, चीन आज इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरियों के मामले में दुनिया का नंबर-वन देश बन चुका है।
मानुएल वेर्मेयर, लुडविगशाफेन में यूनिवर्सिटी ऑफ एप्लाइड साइंसेज में चीनी संस्कृति और व्यापार के बारे में पढ़ाते हैं। उन्होंने कहा, "ईवी से शुरुआत करके, उनके पास जर्मनी को पीछे छोड़ने का जिंदगी में एक बार मिलने वाला मौका था और उन्होंने ऐसा किया।”
आज चीन में बिकने वाली हर दूसरी कार इलेक्ट्रिक है और उनमें से लगभग सभी चीनी ब्रैंड की हैं। अपने सबसे बड़े बाजार में जर्मन कारों की बिक्री बहुत ज्यादा गिर गई है। वेर्मेयर कहते हैं, "मुझे लगता है कि इसका एक बड़ा कारण अहंकार है। मैं पिछले 30 वर्षों से भी ज्यादा समय से चीन के बारे में जर्मन लोगों को इंटरकल्चरल ट्रेनिंग दे रहा हूं। जर्मनों का नजरिया हमेशा यही रहता है: हम श्रेष्ठ हैं, हम उन्हें काम करना सिखा सकते हैं, उन्हें हमसे सीखना चाहिए। लेकिन ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि हम उनसे कुछ सीख सकते हैं, हमें उनकी बात ज्यादा सुननी चाहिए या शायद वे वैसे नहीं हैं जैसा हम सोचते हैं?”
इसके अलावा, जर्मनी बैटरी के लिए चीन पर निर्भर है। वेर्मेयर ने कहा, "भले ही हम बहुत अच्छी ईवी कारें बना लें, फिर भी हमें चीन से बैटरी की जरूरत पड़ेगी। हम पहले से ज्यादा निर्भर हो गए हैं।”
अब जब जर्मन कंपनियों का कारोबार चीन में सिकुड़ता जा रहा है, सारा ध्यान भारत की ओर मुड़ रहा है। यह दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या भारत, जर्मन कार कंपनियों के लिए अगला बड़ा बाजार बन सकता है?
क्या भारत इस कमी को पूरा कर सकता है?
अगर आप भारत के दक्षिण-पूर्व में स्थित चेन्नई शहर के भारी ट्रैफिक को देखें, तो आपको शायद ही कोई जर्मन कार दिखेगी। भारत का डेट्रायट' कहे जाने वाले इस शहर की सड़कों पर भारतीय, जापानी और कोरियाई कारों का दबदबा है, क्योंकि यहां कारों की बहुत सारी फैक्ट्रियां मौजूद हैं।
चेन्नई में बीएमडब्ल्यू का प्लांट एक दिन में सिर्फ 80 कारें बनाता है, जबकि जर्मनी में कंपनी के मुख्य प्लांट में रोजाना 1,400 कारें बनती हैं। इसके बावजूद, यहां विकास की रफ्तार तेज है। हर साल 10 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हो रही है। चेन्नई में बीएमडब्ल्यू प्लांट के मैनेजर थॉमस डोजे कहते हैं, "भारतीय बाजार में बहुत ज्यादा भीड़ है। हर किसी को लगता है कि अगर हम अभी भारत में नहीं हैं, तो हम कोई मौका चूक जाएंगे।”
हालांकि, डोजे वास्तविकता को समझते हैं। उन्होंने कहा, "क्या भारत नया चीन है? मैं कहूंगा- नहीं। यह भारत है और यह अलग है। यहां तरक्की की संभावनाएं तो बहुत हैं, लेकिन हमें यहां चीन जैसी बड़े स्तर की ग्रोथ देखने को नहीं मिलेगी।”
विशेषज्ञ भी इस बात से सहमत हैं। भारत का बाजार उम्मीदों से भरा है, लेकिन जर्मन कार निर्माताओं के सामने कुछ सांस्कृतिक चुनौतियां हैं। वेर्मेयर ने कहा, "हम दुनिया की सबसे बेहतरीन कारें बेचना चाहते हैं, लेकिन कई बार यह जरूरत से ज्यादा तकनीकी हो जाता है। भारत में 80 फीसदी तक काम करना भी काफी होता है। पहले बेचो, फिर लोगों की राय लो और उसके हिसाब से बदलाव करो। यहां परफेक्ट' होने की हमारी सोच इस बाजार के लिए हमेशा सही नहीं बैठती।”
सबक सीखा गया या देर हो गई?
बीएट्रिक्स काइम का मानना है कि जर्मन कार कंपनियां बदलने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने कहा, "वे समझ गई हैं कि उन्हें तेज होना होगा, अपने घमंड से बाहर आना होगा और सीखना होगा।”
इस बीच, बेहतर इलेक्ट्रिक वाहन बनाने की होड़ पूरी रफ्तार से जारी है। चीन में, वहां के स्थानीय ईवी निर्माता जरूरत से ज्यादा उत्पादन और गिरती कीमतों की समस्या से जूझ रहे हैं। बाजार की इस कमी को पूरा करने के लिए वे अब यूरोप का रुख कर रहे हैं। हालांकि, वहां उन्हें अभी वैसी कामयाबी नहीं मिली है जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी।
वक्त का पहिया इस कदर घुमा है कि चीन और बाकी देशों की इलेक्ट्रिक कार कंपनियां अब जर्मनी के उसी मशहूर न्यूर्बर्गरिंग ट्रैक पर अपनी गाड़ियों की टेस्टिंग कर रही हैं, जो कभी जर्मन इंजीनियरिंग का किला माना जाता था। गिरते हुए दबदबे की कहानी में यह एक बड़ा और कड़वा मोड़ है।
क्या जर्मन कार निर्माता यह मौका पूरी तरह से गंवा सकते हैं? रेसिंग ड्राइवर मिशा शारुडिन ने कहा, "ऐसा हो सकता है। नोकिया (फिनलैंड की मोबाइल कंपनी) को ही देखिए। वे बहुत कामयाब थे। फिर अचानक उन्होंने सही समय पर बदलाव का मौका गंवा दिया।”