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हाथी जी के रुपए

बाल कविता
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हाथी जी से हो गई चूक।
खुली छोड़कर गए संदूक।।

बीस रुपए ले गई बिल्ली।
रेल में बैठ, पहुंची दिल्ली।।

सोलह रुपए ले गया भालू।
खरीद लिए दो ‍किलो आलू।।

पन्द्रह रुपए ले गया बंदर।
खरीदे दौ सौ ग्राम चुकंदर।।

चुपके-चुपके आया सियार।
वह भी ले गया रुपए चार।।

होटल देखा मन ललचाया।
उसने तुरंत समोसा खाया।।

संदूक में रुपए थे सत्तर।
कितने बचे बताओ उत्तर।

- शिवप्रताप सिंह 'राजगुरु'
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