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बाल कविता : सच्चे घर‌

बाल कविता
मुझको दे दो प्यारी अम्मा,
दो दो के दो सिक्के।
उन सिक्कों से बनवाऊंगा,
दो सुंदर घर पक्के।

दो सुंदर घर पक्के अम्मा,
दो सुंदर घर पक्के।
इतने पक्के घुस ना पाएं
उनमें चोर उच्चके।

उनमें चोर उच्चके अम्मा,
उनमें चोर उच्चके।
अगर घुसे तो रह जाएंगे,
वे घर में ही फंसके।

अम्मा बोली दो रुपए में,
ना बनते घर पक्के।
ढेर ढेर रुपए लगते हैं,
तब घर बनते अच्छे।

कड़े परिश्रम के बल्ले से,
मारो चौके छक्के।
पैसा रहे पास में तो ही,
घर बनते हैं सच्चे।
लेखक के बारे में
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
12, शिवम सुंदरम नगर, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश (Mo.-+919131442512).... और पढ़ें