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बंदर मामा
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क्षितिजा सक्सेना बंदर मामा, पहन पजामा निकले थे बाजार जेब में उनके कुछ थे पैसे करना था व्यापार एक दुकान थी बड़ी सजीली वहाँ बनी थी गर्म जलेबी मामा का मन कुछ यूँ ललचाया क्या लेना था याद न आया गर्म जलेबी खाई झट से जीभ जल गई फट से, लप से फेंका कुर्ता फेंकी टोपी और भागे फिर घर को दोबारा फिर खाने जलेबी कभी न गए उधर को।