ग्रीष्म ऋतु पर मनोरंजक कविता
- राजेन्द्र देवधरे 'दर्पण'
राम-श्याम
सुबहोशाम
खाते रहते
मीठा आम।
बाल-पाल
गए चौपाल
नहीं मिला
तरबूजा लाल।
तू जा-तू जा
करती पूजा
खुद ले आई
झट खरबूजा।
रानी-बानी
दोऊ सयानी
देती सबको
ठंडा पानी
साभार- देवपुत्र
