Shri krishna janmashtami 2020 : श्याम तेरे कितने रंग


बचपन से गीत सुनते आए हैं कि ‘यशोमति मैय्या से बोले नन्द लाला, राधा क्यों गोरी मैं क्यों काला?? पर इसी सांवली सलोनी मोहिनी सूरत के सभी दीवाने हैं, प्रेमी, आराध्य, राजा, पालक, और इनके जैसे कूटनीतिज्ञ राजनीति निपुण ‘न भूतो न भविष्यति.’काली-काली अंधियारी रात में, कारागार में जन्म लेने वाले, जामुन से रंग की स्याह जमुना को जन्मते ही पार करने वाले ये श्यामवर्ण श्रीकृष्ण अपने इसी रंग से दीवाना बनाए हुए हैं...


इतना दीवाना कि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने प्रेम-माधुरी,82 में लिखा है- यामैं संदेह कछू दैया हौं पुकारे कहौं, भैय्या की सौं मैय्या री कन्हैया जादूगर है और फिर उसमें घुला राधा रस तो निराला ही है...राधा-कृष्ण एक हैं। राधा कृष्ण का स्त्री रूप हैं और कृष्ण राधा का पुरुष रूप। उनकी प्रेम भरी नटखट वाकचातुर्य में श्री कृष्ण की पराजय भी बड़ी मोहिनी है-

कोऽयं द्वारि हरिः, प्रयाह्युपवनं, शाखामृगस्यात्र किं
कृष्णोऽहं दयिते बिभेमि सुतरां, कृष्णादहं वानरात्।
मुग्धेऽहं मधुसूदनः, पिब लतां तामेव तन्वीमलम्
इत्थं निर्वचनीकृतो दयितया ह्रीतो हरि: पातु वः ।।

कृष्ण द्वार पर ध्वनि करते हैं तो राधा जी पूछतीं हैं- यह द्वार पर कौन है?
उत्तर मिला- हरि...

राधा ने कहा- वानर का यहां क्या काम? वन में जाओ...

कृष्ण ने कहा- प्रिये मैं कृष्ण हूं....

तब राधा ने कहा- काले बंदर से तो मैं और भी अधिक डरती हूं...

पुनः कृष्ण ने कहा- हे मुग्धे मैं मधुसुदन हूं...

राधा ने कहा- तो उसी कोमल लता का रसपान करो...


इस प्रकार निरुत्तर किए गए लज्जित कृष्ण सबकी रक्षा करें....

कालकालगलकालकालमुखकालकालकालकालपनकालकालघनकालकाल।
कालकालसित कालका लालनिकालकालकालकालगतु कालकाल कलिकालकाल।।

नीलकंठ, लंगूर तथा यम के समान कृष्ण वर्ण वाले, जलयुक्त काले बादल के समय बोलने वाले मोर के समान आलापनशील, काल के काल तथा कलियुग की मृत्यु हे कृष्ण! काले पन से सिर पर शोभायमान केशों से युक्त , मधुर भाषिणी रमणी आकर्षित हो....

ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियम्
ज्योति: किंचन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते।
अस्माकं तु तदेव लोचन- चमत्काराय भूयाच्चिरम्
कालिन्दीपुलिनोदरे किमपि यन्नीलं अहो धावति ।।

यदि ध्यानाभ्यास से मन को वश वश में करके योगी लोग किसी निष्क्रिय परमज्योति को देखा करते हों तो भले ही देखा करें, हमारी आंखों को चमत्कृत करने के लिए तो यही बहुत है कि हम यमुना तट पर किसी नीले-नीले को दौड़ते हुए देर तक देखते रह जाते हैं....

कालिकालिल तटविन पोटिच्चार्त्तुकोटात्त शोभम्
पीलिवकष्णाल कालत चिकुरम् पीत कौशेय वीरुम्।
कोलुम् कोलक् कुषलुमियलुम बालगोपाललीलम्
कोरम् नीलम् तव नियतवुम् कोयिल कालकेड्ड़चेतः ।।

गोधुली से शोभायमान, मोर पंख से अलंकृत केश वाला, पीत वस्त्रों से आच्छादित शारीर वाला, हाथों में छड़ी और बांसुरी लिए हुए, बाल गोपाल की लीलाओं वाला, सुंदर श्यामल रंग के शरीर वाला यह रूप मेरे मन में हमेशा के लिए स्थिर रहे।

धिग् दाक्ष्यं धिगुदारतां धिगधिकां विद्यां धिगात्मज्ञतां
धिक् शीलं च धिगध्वरादिरचनां धिक् पौरुषं धिग् धियम्।
धिग् ध्यानासनधारणादिकमहो धिङ् मंत्रतंत्रज्ञतां
श्रीकृष्णप्रणयेन हीनमनसां धिग् जन्म
धिग् जीवितम्।।

जिनका मन श्रीकृष्ण के प्रेम से रहित है उनके क्रिया नैपुण्य को धिक्कार है, उदारता, दानशीलता को धिक्कार है, अधिक पढ़ी हुई विद्या को धिक्कार है, आत्मज्ञता को धिक्कार है,शील को धिक्कार है, ध्यान, आसन, धारणा को धिक्कार है, मंत्र-तंत्र की जानकारी को धिक्कार है, जन्म को तथा जीवन को धिक्कार है- कर्णपूर (आनंद वृन्दावन चम्पू, 13/14)




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