पवित्र रमजान माह शबाब पर हैं। बाजारों में चहल-पहल शुरू हो गई है। इस माह की खास नमाज 'तरावीह' के लिए मस्जिदों में तैयारी की गई है। घड़ी की सुइयाँ जैसे ही तड़के 3.45 बजे के वक्त को छूती हैं शहर में अस्सलाम अलैकुम... गूँज उठता है। नींद के आगोश में डूबे रोजदारों को इसी तरह सलाम करके मस्जिद के खिदमतगार सहरी के लिए जगाते हैं।
माइक से हर दस से पंद्रह मिनट के बीच ऐलान किया जाता है... अस्सलाम अलैकुम ... मोहतरम उठ जाइए... सहरी का वक्त हो चुका है। सहरी के लिए 15 मिनट बचे हैं। वक्त खत्म होते ही फजर की अजान होती है और रोजदार घरों से निकल पड़ते हैं मस्जिदों की तरफ और शुरू हो जाता है रमजान के नए दिन की इबादत का सिलसिला।
रमजान के पाक महीने में सुबह सहरी से शुरू होने वाली इबादत का सिलसिला देर रात तरावीह की नमाज तक जारी रहता है। मौजूदा हाल ये हैं कि मुस्लिम बहुल इलाकों में क्या बच्चे, क्या औरतें और क्या बुजुर्ग तकरीबन सभी इबादत में डूबे हैं। मस्जिद में पाँच वक्त की नमाज अदा करने वालों की तादाद में पाँच गुना तक इजाफा होना इस बात की गवाही दे रहा है।
मस्जिदों के ताले आम दिनों में सुबह फजर की नमाज के वक्त से कुछ पहले (सुबह करीब 5 बजे) ही खुलते हैं, लेकिन इन दिनों हर हाल में सुबह 3.30 बजे ताले खुल जाते हैं। मस्जिद की साफ-सफाई, जा-नमाज बिछाने और सहरी के लिए ऐलान किया जाता है।
धीरे-धीरे लोग भी आने लगते हैं और मस्जिदों में मेला-सा लग जाता है।
रोजे का मकसद भूखा रहना नहीं बल्कि बुराइयों से बचना व नेकियों पर चलना है। यह एक माह की ट्रेनिंग है कि बाकी जिंदगी भी ऐसे ही नेकियों पर चलते हुए गुजारी जाए।