ईमान की कसावट
दूसरा रोज़ा (रमज़ानुल मुबारक)
प्रस्तुति- अज़हर हाशमी रोज़ा ईमान की कसावट है। रोज़ा सदाक़त (सच्चाई) की तरावट और दुनियावी ख़्वाहिशों पर रुकावट है। दिल अल्लाह के ज़िक्र की ख़्वाहिश कर रहा है तो रोज़ा इस ख़्वाहिश को रवानी(गति) देता है और ईमान को नेकी की खाद और पाकीज़गी का पानी देता है। लेकिन रोज़ा रखने पर दिल दुनिया की ख़्वाहिश करता है तो रोज़ा इस पर रुकावट पैदा करता है। पवित्र रमज़ान में अल्लाह का फ़रमान है 'या अय्युहल्लज़ीना आमनु कुतेबा अलयकुमुस्स्याम' यानी 'ऐ किताब (क़ुरआन पाक) के मानने वालों रोज़ा तुम पर फ़र्ज़ है।' इसके मा'नी (मतलब) यह भी है कि किताब और रोज़े को समझो। यानी क़ुरआन को समझ कर और सही पढ़ो (इसका मतलब यह है कि पवित्र क़ुरआन ख़ुदा का यानी अल्लाह का कलाम है और उसको अदब और खुशूअ (समर्पण की भावना) के साथ पढ़ो। उसकी मनगढ़ंत या मनमानी व्याख्या मत करो। क्योंकि क़ुरआन इंसाफ़ की यानी अल्लाह की किताब है।ऱोजे को समझना सबसे बड़ी बात है।