पल्लव वंश के नरसिंहवर्मन प्रथम ने हराया था पुलकेशिन द्वितीय को

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अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: शुक्रवार, 2 जुलाई 2021 (17:49 IST)
मध्यकालीन भारत की सीरिज में हमने जाना की उत्तर भारत में जहां सम्राट हर्षवर्धन का साम्राज्य था वहीं दक्षिण भारत में चालुक्य वंश के का दबदबा था। परंतु पल्लवशंव के राजाओं से चालुक्यवंशी राजाओं की टक्कर होती रहती थी। आओ जानते हैं के बारे में संक्षिप्त में।
1. ऐसा माना जाता है कि पल्लवों द्वारा स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के पूर्व वे सातवाहनों के राजा के सामान्य थे।
2. ऐसा कहीं उल्लेख मिलता है कि समुद्रगुप्त के द्वारा पराजित कांची के नरेश का नाम विष्णुगोप था। उसके पहले शिवस्कन्द वर्मन का शासन था।

3. पल्लवों का शासन बाद में कांची से ही प्रारंभ हुआ। उनका शासन क्षेत्र तमिल और तेलगु था। उन्हीं के राज्य में महान दार्शनिक बोधिवर्मन थे, जिन्हें पंलववंशी ही माना गया है। पल्वलवंशी की राजधानी कांची (तमिलनाडु में कांचीपुरम) थी।
4. विष्णुगोप के बाद जिस पल्लव राजा का इतिहास में उल्लेख मिलता है उसका नाम है सिंह विष्णु (575-600 ई.)। पल्लव राजवंश का श्रीगणेश इसी से होता है।

4. विष्णु के उपासक सिंहविष्णु ने कलभ्रों द्वारा तमिल प्रदेश में उत्पन्न राजनीतिक अव्यवस्था का अंत किया और चोल मंडलम् पर पल्लवों का अधिकार स्थापित किया था। अवनिसिंह इसका विरोधी शासक था।

5. सिंहविष्णु के राज्य में भी ही संस्कृत के प्रसिद्ध कवि भारवि थे जिनको आश्रम मिला।

6. सिंहविष्णु के बाद उसका पुत्र महेंद्रवर्मन प्रथम (600-630 ई.) में सम्राट बना। उसके काल में चालुक्यों से उसका संघर्ष होता रहता था। परंतु उसकी सेना ने कभी भी हार नहीं मानी। महेंद्रवर्मन पहले जैन था, परंतु बाद में तमिल संत अप्पर के प्रभाव में आकर शैव बन गया था।

7. महेंद्रवर्मन प्रथम के शासन काल में एक बार चालुक्य सम्राट पुलकेशिन् द्वितीय की सेना पल्लव राजधानी के एकदम करीब पहुंच गई थी। परंतु सम्राट की सेना ने बहादुरी से मुकाबला किया और पुल्ललूर के युद्ध में चालुक्यों को बुरी तरह से पराजित कर दिया। इसी के साथ ही पल्लवों ने साम्राज्य के कुछ उत्तरी भागों को छोड़कर शेष सभी की पुनर्विजय कर ली।
8. महेंद्रवर्मन प्रथम के बाद उसका पुत्र नरसिंहवर्मन् प्रथम (630-668) गद्दी पर बैठा और उसके शासन में पल्लव दक्षिणी भारत की प्रमुख शक्ति बनकर उभरे। उसने चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के 3 आक्रमणों को सफलतापूर्वक कर दिया।

9. चालुक्यों के लगातार आक्रमण के चलते सम्राट ने चालुक्यों को सबक सिखाने के लिए 642 ईस्वी में उसकी सेना ने आक्रमण कर दिया और चालुक्यों की राजधानी वातापी पर अपना परचम लहरा दिया।

10. इस युद्ध में पुलकेशिन द्वितीय की मृत्यु हो गई। इसके बाद सम्राट नरसिंहवर्मन् प्रथम ने वातापिकोंड की उपाधि धारण की। जिस पुलकेशिन द्वितीय ने कभी उत्तर भारत के शक्तिशाली सम्राट हर्षवर्धन को हराया था उसकी नरसिंहवर्मन् प्रथम ने मिट्टी में मिला दिया।

11. पुलकेशिन द्वितीय के बाद उसका पुत्र सत्याश्रय ( 655-681 ई.) जिसको विक्रमादित्य प्रथम भी कहते हैं उसने राज्य पर अपना अधिकार जमाया और पल्लवों से सामना करत हुए अपने पराक्रम और साहस से चालुक्यों की शक्ति और गौरव को पुन:स्थापित किया
शासक : शासन काल
सिंहविष्णु : 575-600 ईस्वी.
महेन्द्र वर्मन प्रथम 600-630 ईस्वी.
नरसिंह वर्मन प्रथम 630-668 ईस्वी.
महेंद्र वर्मन द्वितीय 668-670 ईस्वी.
परमेश्वर वर्मन प्रथम 670-695 ईस्वी.
नरसिंहवर्मन द्वितीय 695-720 ईस्वी.
परमेश्वर वर्मन द्वितीय: 720-730 ईस्वी.
नंदिवर्मन द्वितीय: 730-795 ईस्वी.
दंतिवर्मन : 796-847 ईस्वी.
नंदिवर्मन द्वितीय: 847-872 ईस्वी.
नृपतंगवर्मन 872-882 ईस्वी.
अपराजित वर्मन: 882-897 ईस्वी.
पल्लवों के सामंत आदित्य प्रथम ने अपनी शक्ति बढ़ाई और 893 ईस्वी के लगभग अपराजित को पराजित कर पल्लव साम्राज्य को चोल राज्य में मिला लिया। 1070 ईस्वी तक चोलवंश का शासन चला। इसके बाद कुलोतुंग चोल से चोल चालुक्य का शासन प्रारंभ हुआ, जो 1279 ईस्वी तक चला। इसके बाद संपूर्ण राज्य पांड्य राजाओं के अधिन चला गया। सन् 1618 ईस्वी तक पांड्य राजाओं का इस क्षेत्र पर शासन रहा।



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