खुला आसमान, ऊँची उड़ान
ज़ज्बा कुछ कर दिखाने का
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सपने देखना कोई बुरी बात नहीं है। सपनों से ही उड़ान की उम्मीदें जागती हैं। अगर मन में कुछ कर गुजरने का ज़ज्बा हो तो कुछ भी असंभव नहीं होता।
भारतीय महिलाओं ने भी इसी बात को सच साबित करते हुए आर्थिक क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की है। यही कारण है कि भारत की 86 प्रतिशत महिलाएँ आर्थिक आजादी को अपनी अहम जरूरत मानती हैं।
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भारत की युवा महात्वाकांक्षी महिलाएँ अब अपने भविष्य को लेकर सजग व गंभीर हैं। आज वे खुले तौर पर बाहर आकर बाजार की हर चुनौती को स्वीकार कर रही हैं।
लीक से हटकर कुछ करने की ललक ने उन्हें आज सफलता के मुकाम तक पहुँचाया है। कल तक शादी के बाद अपने करियर को विराम देने वाली भारत की 77 प्रतिशत महिलाएँ आज शादी के बाद भी अपने काम को जारी रखना चाहती हैं।
अर्थव्यवस्था 9 प्रतिशत वार्षिक से अधिक दर से कुलांचे भर रही है। बीपीओ और बायोटेक्नोलॉजी जैसे नए उद्योगों में 2010 तक 23 लाख तथा 2012 तक 10 करोड़ लोगों के रोजगार पाने की उम्मीद है।
एक सफल राजनेता से लेकर गायिका तक, पायलट से लेकर लोको पायलट तक और फोटोग्राफर से लेकर महिला जज की कुर्सी तक हर जगह महिलाओं ने अपनी प्रतिभा का डंका बजाया है और दुनिया को यह कहने पर मजबूर कर दिया है कि 'हम किसी से कम नहीं'।
कोमल काया वाली नारी आज फौलाद सी मजबूत बनकर किरण बेदी के रूप में अपराधियों को सद्मार्ग की राह दिखा रही है तो वहीं नम्रता चांडी बनकर भारतीय वायुसेना की शान बन लेह और सियाचिन में उड़ान भर रही है। भय और झिझक को जैसे भारतीय महिलाओं ने 'गुड बाय' कहकर अपनी नई राह को खुद चुना है।
भारतीय महिलाओं की इस कामयाबी का श्रेय उनके उस जुनून व ज़ज्बे को देना होगा जिसे आज दुनिया सलाम करती है। उनका यह ज़ज्बा एक प्रेरणा पुंज बन सकता है उन महिलाओं के लिए जो कुछ कर गुजरने का सपना सँजोती हैं।
उनके ये सपने आजादी के उन्मुक्त परिवेश में सफलता के पंख फैलाकर साकार होने में पीछे कदम नहीं हटाते हैं। घर के चौके-चूल्हे से आसमान में उड़ाने भरने तक की भारतीय महिला की इस यात्रा का विराम नि:संदेह ही काबिले तारीफ होगा।
