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Written By WD

मानो तो गंगा मैया

मिनी बस नारी
WDWD
-सर्वोत्तम वर्मा

वह गाँधी रोड तिराहे पर मिनी बस से उतरकर यूनिवर्सिटी की ओर चल दिया था। अभी दस कदम भ‍ी नहीं चला था कि पीछे से किसी नारी स्वर ने कहा, 'जरा धीरे नहीं चल सकते क्या? मुझे दौड़ना पड़ रहा है।'

वह रुक कर पीछे देखने लगा। लगभग दौड़ते हुए आकर वह उससे टकरा गई। हाँफ रही थी सो थोड़ा सुस्ताकर बोली, 'थोड़ी भी दया ह्रदय में होती तो मुझे इस तरह नहीं दौड़ाते। एक हफ्ते की बीमारी से उठकर मुझसे दौड़ते नहीं बन रहा। शरीर में कमजोरी अभी भी बहुत है।'

'मेरा तुम्हारी बीमारी हारी और कमजोरी से क्या संबंध? मैंने नहीं कहा तुमसे दौड़ने के लिए। तुम दौड़ो चाहे चलो, मुझे क्या लेना देना?'

'लेकिन मुझे तो तुमसे लेना-देना है।'

'पर मुझे नहीं। मैं जानता हूँ तुम जैसी लड़कियों को।' कहकर वह तेजी से यूनिवर्सिटी की ओर चल दिया।

'हे भगवान, अब मैं क्या करूँ? कृपया मत जाइए। लौट आइए।'

उसके कहने का भाव था या उसके स्वर की दीनता। वह उल्टे पैरों वापस आकर उसके पास रुका, कुछ
कहता इसके पहल ही वह बोली, 'मैं आपके हाथ जोड़ती हूँ। पहले ही काफी थक गई हूँ। कृपया मेरे साथ उस पेड़ के नीचे अंधेरे में आइए। मुझपर दया कीजिए।'

किसी अज्ञात के वशात वह उसे लेकर पेड़ के नीचे अंधेरे में पहुँचा। उसने अपने ब्लाउज के भीतर हाथ डालकर एक पर्स निकाल कर उसे दिया, कहा, 'यह मेरे पास था इसलिए आपके पीछे दौड़ना पड़ा। देख लीजिए, मैं बिना पूछे लेनेवाली चोर नहीं हूँ। अब आप जितना दे देंगे, ले लूँगी।'

उसके दिए पर्स को पहचानकर वह चकित रह गया। वापस उसी के हाथ में पर्स ठूँसकर वह बोला, 'तुम्हें मेरा पर्स कहाँ से मिला?'

'जब तुम बस में चढ़े थे उसी समय पर्स मेरी छाती से आ लगा था। चूँकि टिकट के पैसे तुमने कमीज की जेब से दिए थे इसलिए जान नह‍ीं सकें।'

'जब तुम्हें पूरा पर्स मिल गया था तो अब वापस क्यों कर रही हो? तुम्हारी मेहतन की कमाई है। रख लो इसे।'

यह मेहनत की कमाई नहीं होती। तुम्हारी असावधानी से तुम्हें चेता रही हूँ, इसकी फीस जो तुम दोगे ले लूँगी। वह कमाई फलेगी।'

'कितनी चाहिए तुम्हें।'

'ज्यादा से ज्यादा पचास रूपए' कम भी दे सकते हो।'

'जानती हो इस पर्स में कितने रुपए हैं?'

'सत्तरह से पैसठ'

'तुम कमाल हो। क्या मैं तुम्हें एक बार किस कर सकता हूँ।'

'नहीं। धन के अनुशासन में तन की वासना के लिए कोई स्थान नहीं।'

उसने पर्स से पचास का नोट निकालकर पचास रुपए का एक नोट उसे दे दिया। जिसे उसने अपने ब्लाउज के भीतर खोंसकर कहा, 'धन्यवाद, मानो तो गंगा मैया नहीं तो बहता पानी। मैं जाती हूँ। पक्की जेबकटी जो ठहरी।'

और तभी आकर रूकी मिनी बस में लपककर वह अंतर्ध्यान हो गई।