काम ही क्या है?
लघुकथा
मंगला रामचंद्रन
पति के दफ्तर जाने के बाद घर को जस का तस छोड़कर वह कभी पत्रिका पढ़ती, कभी टीवी खोलकर देखती। शाम तक समय को यूँ ही निकालकर पति की राह देखने लगी। शाम को पति महोदय प्रतिदिन की तरह यूँ थके-माँदे लग रहे थे मानो उनकी तरह मेहनत कोई और करता ही न हो। रोज की तरह 'हाय-हाय' करते हुए सोफे पर पसर गए और करने लगे चाय का इंतजार।
कुछ समय यूँ ही निकल गया और उन्हें घर की फिजा कुछ कुछ बदली-बदली लगी। सूँघते हुए पत्नी जहाँ थी, वहाँ पहुँचे।
आश्चर्य! पत्नी किसी पुस्तक को पढ़ने में तल्लीन थी। पति को देखते ही बोली, 'अरे आप आ गए!'
अब तक पति ने घर के बिखरे हालात पर नजर डाल ली थी। रोज की तरह सुबह उसने नहाकर गीला तौलिया बिस्तर पर फेंक दिया था, जो आज पहली बार अभी वैसा ही पड़ा था। ड्रेसिंग टेबल पर नाश्ते की प्लेट, चाय का मग सब सूखे-गंदे पड़े हुए थे।
और तो और, नाइट सूट का पायजामा फर्श पर ज्यों का त्यों उतरा हुआ पड़ा था। पूरे घर का आलम लगभग यही था। रोज शाम को घर जिस तरह व्यवस्थित रहता था, उसका लेशमात्र भी चिह्न नहीं था। पति महोदय की त्यौरी चढ़ गई, माथे पर बल पड़ गए, 'क्या बात है? आज तुम्हारी और घर की हालत अस्त-व्यस्त क्यों लग रही है? तबीयत तो ठीक है? ठीक ही लग रही है!'
तबीयत तो ठीक है। घर की हालत तो अस्त-व्यस्त होगी ही।'
पत्नी ने बड़ी सहजता से कहा।
'क्या मतलब'? पति चिहुँका।
'आप रोज तो उलाहना देते थे कि आपके दफ्तर जाने के बाद मुझे काम ही क्या रहता है। मैं कभी भी ढंग से गिना नहीं पाती और बेवकूफ की तरह एक जुमला उछाल दिया करती थी कि 'कभी करना पड़े तो पता चले।' सो आज वही दिन है।' पत्नी की आँखों में शरारत की चमक भी थी।
' मैं समझा नहीं!' पति कुछ सहमकर बोला।
'
आज मैंने वह सब काम नहीं निपटाए जो रोज आपके जाने के बाद किया करती थी। आप एक-एक काम निपटाते जाएँगे तो समझ ही जाएँगे कि मैं क्या-क्या करती हूँ।
साथ ही आपको करते हुए देखकर गिनती जाऊँगी और मुझे भी पता लग जाएगा कि मैं कितना काम करती हूँ।
पति मुँह बाए पत्नी को देखता रह गया। उसके मुँह से बोल फूटे ही नहीं।
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कुछ समय यूँ ही निकल गया और उन्हें घर की फिजा कुछ कुछ बदली-बदली लगी। सूँघते हुए पत्नी जहाँ थी, वहाँ पहुँचे।
आश्चर्य! पत्नी किसी पुस्तक को पढ़ने में तल्लीन थी। पति को देखते ही बोली, 'अरे आप आ गए!'
अब तक पति ने घर के बिखरे हालात पर नजर डाल ली थी। रोज की तरह सुबह उसने नहाकर गीला तौलिया बिस्तर पर फेंक दिया था, जो आज पहली बार अभी वैसा ही पड़ा था। ड्रेसिंग टेबल पर नाश्ते की प्लेट, चाय का मग सब सूखे-गंदे पड़े हुए थे।
और तो और, नाइट सूट का पायजामा फर्श पर ज्यों का त्यों उतरा हुआ पड़ा था। पूरे घर का आलम लगभग यही था। रोज शाम को घर जिस तरह व्यवस्थित रहता था, उसका लेशमात्र भी चिह्न नहीं था। पति महोदय की त्यौरी चढ़ गई, माथे पर बल पड़ गए, 'क्या बात है? आज तुम्हारी और घर की हालत अस्त-व्यस्त क्यों लग रही है? तबीयत तो ठीक है? ठीक ही लग रही है!'
तबीयत तो ठीक है। घर की हालत तो अस्त-व्यस्त होगी ही।'
पत्नी ने बड़ी सहजता से कहा।
'क्या मतलब'? पति चिहुँका।
'आप रोज तो उलाहना देते थे कि आपके दफ्तर जाने के बाद मुझे काम ही क्या रहता है। मैं कभी भी ढंग से गिना नहीं पाती और बेवकूफ की तरह एक जुमला उछाल दिया करती थी कि 'कभी करना पड़े तो पता चले।' सो आज वही दिन है।' पत्नी की आँखों में शरारत की चमक भी थी।
' मैं समझा नहीं!' पति कुछ सहमकर बोला।
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साथ ही आपको करते हुए देखकर गिनती जाऊँगी और मुझे भी पता लग जाएगा कि मैं कितना काम करती हूँ।
पति मुँह बाए पत्नी को देखता रह गया। उसके मुँह से बोल फूटे ही नहीं।
