हम ठहरे आवारा पंछी
काव्य-संसार
विलास पंडित 'मुसाफ़िर' अपनी तो गुजरी है अक्सर अपनी ही मनमानी में लेकिन अच्छे काम भी हमने कर डाले नादानी में। हम ठहरे आवारा पंछी, सैर गगन की करते हैं क्या करना है जान के हमको कौन है कितने पानी में। रूह को उसकी राह का पत्थर बनना ही मंज़ूर न था बाज़ी हमने ही जीती है अपनी इस कुर्बानी में। मेहनत करके आखिर हम तो भूखें भी सो जाएँगेया मौला, तू बरकत रखना बच्चों की गुड़धानी में। यार नई कुछ बात भी हो तो,हम भी सजदा कर लेंगे अक्सर एक ही बात सुनी है सब संतों की बानी में। मौके तो हम तक भी आए खूब कमा खा लेते हम लेकिन एक ज़मीर था भीतर अल्लाह की निगरानी में। काम ही करते-करते आए मौत 'मुसाफ़िर' की हसरत क्या करना है ज्यादा जीकर इस दुनिया-ए-फानी में।