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Written By WD

ससुराल का पहला दिन

- डॉ. रुचि बागड़देव

साहित्य
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अनंत में अवस्थित

असंख्य आकाशगंगाओं का प्रकाश

अनगिनत वर्षों के अति उत्साह से

किसके दर्शनों की अभिलाषा लिए हुए

किससे मिलने को आतुर था मन

ढोलक की थाप पर, मृदंग की ताल पर,

मंद हवा के झोंके जैसे मुझे लुभाता

कौन चला आ रहा है...

एक निशा के गुजर जाने के बाद,

सामने सुबह को साथ लिए,

पूजा की थाली के फूलों सा

महकता महकाता कौन चला आ रहा है

दीवारों पर कुंकु के छापे देता

माँग में दमकते सिंदूर सा चमकता

ये कौन चला आ रहा है -

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ये कौन चला आ रहा है

मैंने हौले से जब खिड़की खोली

सामने खड़ा था ससुराल का पहला दिन ।


साभार : शुभ तारिका