समय की गंध समय की गंध कभी-कभी यादों की दराज खोलते ही कैसी तीखी हो उठती है बीते हुए समय की गंध! नैप्थीन की गोलियों की तरह समय की ठोस तेज गंध। मैं बचना चाहती हूँ इससे और चाहती हूँ इसे सूँघना भी।
बीता हुआ कल पुरातात्विक खंडहर नरम पत्थर पर खुदी कलाकृति सा ठोस और कठोर है, नहीं ध्वस्त किया जा सकता तेज धारदार पैनी छुरी से भी। जो कुछ हुआ और हो रहा है सबकी मूक गवाह अभिशप्त यक्ष सी मैं मर्मान्तक स्मृतियों को संवेदनात्मक स्तर पर दुहराते हुए अव्यक्त पीड़ा से गुजरती हूँ। अतीत का पुल पार कर अनेक चेहरे आ खड़े होते हैं जब-तब और मैं महसूसती रह जाती हूँ सबकी अलग-अलग तेज गंध। प्रतिबद्धता मेरी कविता जुड़ी रहना चाहती है अपने देश से देश से यानी दिल्ली, बंबई, कलकत्ता, मद्रास जैसे महानगरों से नहीं दूर सुदूर के अनाम गाँवों आदिवासी बस्तियों इतिहास से उन्मूलित किए जाते कबीलों, जनजातियों और मिटाई जाती लोक संस्कृतियों से यह बेरुखी से मूँद आँखें व्यवस्था और तंत्र की अमानवीयता से, केवल खुद के बनाए शब्दों के इंद्रजाल में नहीं उलझी रहना चाहती चाहती है आँकना रोग शोक विछोह उदासीनता भरा रोजमर्रा का जीवन मिथकों के अबूझ जगत और अंधविश्वास के कोहरे से निकल पकड़ हाथ शब्दों का चाहती है पहुँचना अभिव्यक्ति की खतरनाक ऊँचाइयों तक लिखना चाहती है दुःख और करुणा से भीगी धरती की व्यथा-कथा और आम आदमी की आँखों की रोशनी।
मेरी गली के बच्चे मेरी गली के बच्चे पहले बच्चे हुआ करते थे खेलते थे सर्दियों में गोलियाँ कँचे रस्सी बाँध बैडमिंटन लड़कियाँ जमीन पर खींच लकीरें बना चौखाने इक्कड़ दुक्कड़। गर्मियों में जुट जाती थी क्रिकेट टीम न बॉल की चिंता न बैट की परेशानी कपड़े की गेंद और डंडे से ही सही वे मारते थे छक्के गिराते थे विकेट और सुन पड़ती थी उनकी रनिंग कमेन्ट्री धाराप्रवाह बरसात में वे खेलते थे फुटबॉल कीचड़ से लथपथ मेरी गली के बच्चे चिल्लाते थे गोल, 'गो ऽ ऽ ऽ ल' और फूट निकलता था उनके कंठ से खुशी का अजस्र स्रोत फिर घुलते ही हवा में शारदीया गंध वे उड़ाते थे पतंगें बहुरंगी पतंगों के साथ ही उड़ते थे उनके बाल मन भी अन्तहीन आकाश में पर जब से घुसपैठ हुई है मेरी गली में बहुमंजिली इमारतों की और टंग गई है उनकी छतों पर छतरीनुमा एंटीना आकाश गगनचुम्बी इमारतों के बीच पैबन्द सा चिपका नजर आने लगा है बच्चों के भी छिन गए हैं जमीन-आसमान दोनों मौसम के बदलते रंग अब उन्हें नहीं गुदगुदाते शाम-रात-दोपहरी मिलते ही मौका वे हाथ-पैर समेट सिमट जाते हैं कमरों में और देखने लगते हैं सी.एन.एन., स्टार, केबल पर ब्रेक्स, विज्ञापन जादुई तिलस्मी सिनेमा अब वे खेल खेलते नहीं, खेल देखते हैं और खेल की बातें भर करते हैं कहानियाँ भी नहीं सुनते वे अब दादी-नानी की स्नेहिल गोद की जगह ले ली है कॉमिक्सों ने 'अव्वल नम्बर' के दीवाने बच्चे सपने में अब लाल-नीली परी सी निंदिया रानी को नहीं देखते देखते हैं तो जूही और करिश्मा का करिश्मा। मेरी गली के बच्चे असमय बड़े हो गए खो गया न जाने कहाँ उनका बचपन और छोड़ दिया उन्होंने खेलना।
चंद्रा पांडे कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हैं । भीष्म साहनी और प्रेमचंद की कहानियों के बांग्ला भाषांतर की यथेष्ट चर्चा रही। कई आलोचना ग्रंथ प्रकाशित। पहला कविता संग्रह 'उत्सव नहीं है मेरे शब्द' के बाद 'आकाश कहाँ है' प्रकाशित।