सच्ची पापा, नयन तरसते हैं
-सहबा जाफरी
सैलानी बादल शहर में ज्यादा देर न सजते हैंपापा मौसम गाँवों वाले, कहाँ पे बसते हैं।बारिश भी बारिश के जैसी कम-कम लगती हैना कागज की नाव बनाकर बच्चे गाते-हँसते हैं।न शहरों के कमरों में हवा सुहानी आती हैना ही रात को आँखों में चाँद-सितारे सजते हैं।
गुड़-धानी मूँगफलियाँ बेरी, यहाँ कहाँ कोई खाता हैबैक समोसे खाकर सारे ऊपरी मन से हँसते हैं। दिल दुखने पर माँ का आँचल हमें नहीं मिल पाता हैधूल धुएँ की तलछट में ही ख़्वाब सिसकते रहते हैं।अपनी छत से गुलमोहर का भीगा मंजर देखने कोसच्ची पापा कभी-कभी तो नयन खूब तरसते हैं।