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शिनाख्त कर ली है मैंने

साहित्य
- नंदलाल भारती
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शिनाख्त कर ली है मैंने, कातिलों की,

वही हैं वे जो चाहते हैं,

दूर रहूँ, आँख उठाकर भी न देखूँ

मेरी आँखों की बाढ़ और टूटते हुए सपने,

अच्छे लगते हैं उनको।

धुन का पक्का हूँ मैं भी

बदले का भाव मेरे मन में नहीं है,

ना किसी तरह का कोई बैर भी।

निखरी छाप छोड़ना चाहता हूँ

कातिलों के हमले थम नहीं रहे हैं

चाहते हैं कैदी बना रहूँ।

विकास की दौड़ में बहुत पीछे छूट गया हूँ।

कातिल है कि पीछे ही खींचने में जुटे हैं,

मैं आगे जाना चाहता हूँ

सदियों की खींचतान में पर उखड़ गए हैं

तरक्की से वंचित हो गया हूँ।

खींचातानी में पाँव नहीं जमा पा रहा हूँ

धैर्य मजबूत होता जा रहा है

विकासा की बयार चौखट तक नहीं पहुँच रही है

कुछ लोग धर्म-जाति का जहर बो रहे हैं।

सच यही विकास के दुश्मन हैं,

समाज को विखंडित करने के बहाने हैं,

नफरत के तराने हैं,

उग्रवाद के पोषक हैं, वंचितों के शोषक हैं।

शिनाख्त तो हो गई है कातिलों की

खुद को खंगाल ले, मानवता का दामन थाम ले,

कर दे कातिलों को अपने से बहुत दूर

क्योंकि ये कातिल विकास में बाधक है

और कायनात के दुश्मन भी...