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वो हिसाब नहीं माँगती
शोभना चौरे वो कभी हिसाब नहीं माँगतीतुम एक बीज डालते होवो अनगिनत दानें देती है बीज भी उसी का होता है,और वो ही उसे उर्वरक बनाती है अपनी कोख में अनेक कष्ट सहकरउस बीज को पुष्ट बनाती हैऔर जब अंकुरित होअपने हाथ पाँव पसारता हैतब वो खुश होती है आनन्दित होकर तुम्हें पनपने देती हैकिंतु तुम उसे कष्ट देकर बाहर आ जाते होइतराने लगते हो अपने अस्तित्व परपालते हो भरम अपने होने कालोगों की भूख मिटाने कातुम बड़े होकर फिर फैल जाते होउसकी छाती परअपना हक़ जमानेतुम हिसाब करने लगते होउसके आकार का,उसके प्रकार काभूल जाते हो उसकी उर्वरा शक्ति को,जो उसने तुम्हें भी दीं तुम निस्तेज हो पुनःउसी में विलीन हो जाते होन ही वो बीज को दर्द सुनाती है न ही बीज डालने वाले कोवो निरंतर देती जाती है, वो धात्री है।