मंगलवार, 6 जनवरी 2026
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Written By WD

विरह का अनमोल साथी

दीपाली पाटील

साहित्य रोमांस
ND
भोर के तारे ने एक दिन कहा मुझसे
तुम क्षण भर के लिए मुझ पर
अपनी दृष्टि स्थिर रखना
मैं जैसे ही टूटकर ‍गिरने लगूँ
तुम अपने प्रिय की चाह करना
देखी नहीं जाती क्योंकि मुझसे
तुम्हारी आँखों में सूनेपन की छाया।

इतना स्वार्थी हो नहीं सकता किन्तु
तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम
मेरे सुख के लिए टूटने को तैयार
दूर आकाश में टिमटिमाता
वह तारा ही तो एकमात्र साक्षी है
प्रतीक्षा की उन अनगिनत रातों का।

मुझसे बिना पूछे जो बहती थीं
उसकी मूक सांत्वना की छाया में
वो अश्रुधाराएँ चाँदी सी चमकती थी।
तुमसे कभी कह न सकी
वो तमाम बातें और
दिल के सूनेपन में लिखी हुई
यादों की किताब के सारे पन्ने
मैंने उसको ही सुनाए थे
उसने भी सहानुभूति के आँसू
प्रभात में पँखुरियों पर बिखराए थे।

इसलिए मैं खोना नहीं चाहती
विरह का वो अनमोल साथी
बस इतना भर चाहती हूँ
मेरे न रहने पर कभी
जब तुम निहारों सूना आकाश
तो वह नन्हा सितारा झिलमिलाए
बड़े जतन से सहेजी हुई
मेरे अर्थहीन प्रेम की गाथा
चुपके से तुमको कह सुनाए
तुम्हारी आँखों पर ठहरी बूँदों को
मेरा तर्पण समझकर मुस्कुराए।