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Written By WD

वह दिन भी आ ही गया

राजकुमार कुंभज
राजकुमार कुंभज
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वह दिन भी आ ही गया

जब, वह पचपन की हो गई

और मैं रह गया

बचपन का एक बार फिर-फिर...

यह आश्चर्य की नहीं

प्रेम की पराकाष्ठा थी

मेरी आकांक्षा मेरी थी,

उसकी वह जाने

सूर्योदय की गरिमाएँ और लालिमाएँ

पूर्ववत थीं और संभवत: अपनी तरह ही

जिसमें हर कहीं अंकुरित हो रहा था प्रेम

जैसे ज़मीन में जमकर अंकुरित होता है

आलू ।