वह ऋतु है वसंत की
रेखा भाटिया
वह ऋतु है वसंत की, कभी ठंडी कभी गर्म,कभी झूम पड़ती रिमझिम सावन-सी,कभी खामोश रहती सर्द रातों-सी,सदा खिली रहती फूलों में बहारों-सी ,तितली-सी मंडराती हर क्षण का स्वागत करती,कभी घनघोर काली घटा-सी बिगड़ पड़ती,अगले ही पल सूरज की चमक आँखों में भर लेती,स्वयं प्रकृति की अदभुत कृति है वह,न छल,न छलावा,खुशियों का है पिटारा,जितना समझो उतनी ही सरल,अल्हड़ बहती नदी-सी नट-नर्तकी,कई गुणों से सजी है वह ,स्वयं ब्रह्मा को जिस पर नाज है,ऐसी अनोखी परी है वह,वह ऋतु है वसंत की।