रिश्तों की 'रेखा'
-महेंद्र तिवारी
भाग्य ने रिश्तों की रेखा उकेरीहै जो सबसे न्यारी और गहरी। सजेगी उससे गृहस्थी की देहरीखुशियाँ बनेंगी जिसकी प्रहरी।सुखों की वह होगी सहचरीजीवन गाएगा प्रेम की लोरी।वैसे है वह गाँव की गौरीलेकिन नहीं उसका कोई होरी।
हसरत अपनों की अब होगी पूरीछेड़ेगा आँगन चैन की स्वरलहरी।चलेंगे उसका साया बनकर सावन हो या जेठ की दोपहरी।देना है इसे इतना अनंत विस्तार घर की नींव लगे मंदिर का आधार।