Poem | रिश्तों की ''रेखा''
-महेंद्र तिवारी
ND
है जो सबसे न्यारी और गहरी।
सजेगी उससे गृहस्थी की देहरी
खुशियाँ बनेंगी जिसकी प्रहरी।
सुखों की वह होगी सहचरी
जीवन गाएगा प्रेम की लोरी।
वैसे है वह गाँव की गौरी
लेकिन नहीं उसका कोई होरी।
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छेड़ेगा आँगन चैन की स्वरलहरी।
चलेंगे उसका साया बनकर
सावन हो या जेठ की दोपहरी।
देना है इसे इतना अनंत विस्तार
घर की नींव लगे मंदिर का आधार।
