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मौसम के अखबार में
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हरीश निगम मौसम के अखबार में,ताजा छपी खबर,सूरज की गुंडागिरी, फिर से हर दोपहर।दिन आतंकी हो गए, हाल किए बेहाल,चाकू लेकर धूप का,करने लगे हलाल।भीतर कितनी आँधियाँ,बाहर भी तूफान,आज हँसी के गाँव में,दुर्लभ है मुस्कान।देह नदी की ढल गई,प्यासे-प्यासे कूप,धूल-धूसरित हो गए,वो वासंती रूप।कहाँ फूल की गायकी,कहाँ तितलियाँ-राग,जंगल के संसार में, बची आग ही आग।जहर हवाओं में घुला,टीसे लू के दंश,पथराई आँखें लिए,हरियाली निर्वंश।धूप-धूप जब से हुए,छाया के अनुवाद,ठूँठे रिश्ते, रेत मन। छाया है अवसाद।