मैं बनना चाहता हूँ
- मोहन वर्मा
अगर बन सकूँ तो
बनना चाहता हूँ
नीम का पेड़।
जिसकी पत्तियाँ बावजूद
तमाम कडुवाहट के करती हैं
भीतर का रक्त शुद्ध।
अगर बन सकूँ तो
बनना चाहता हूँ
सुई किसी चिकित्सक की
जो बावजूद क्षणिक दर्द के
करती है काया को निरोगी।
अगर बन सकूँ तो
बनना चाहता हूँ
पासंगरहित तराजू जो
तौल सके ठीक-ठीक
और कर सके दिए गए मूल्य का
सही हक अदा।
अगर बन सकूँ
तो बनना चाहता हूँ
मुस्कुराहट किसी मासूम की
जो बदलते माहौल में भी
जिलाए है एक खुशनुमा उम्मीद।
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बनना चाहता हूँ
नीम का पेड़।
जिसकी पत्तियाँ बावजूद
तमाम कडुवाहट के करती हैं
भीतर का रक्त शुद्ध।
अगर बन सकूँ तो
बनना चाहता हूँ
सुई किसी चिकित्सक की
जो बावजूद क्षणिक दर्द के
करती है काया को निरोगी।
अगर बन सकूँ तो
बनना चाहता हूँ
पासंगरहित तराजू जो
तौल सके ठीक-ठीक
और कर सके दिए गए मूल्य का
सही हक अदा।
अगर बन सकूँ
तो बनना चाहता हूँ
मुस्कुराहट किसी मासूम की
जो बदलते माहौल में भी
जिलाए है एक खुशनुमा उम्मीद।
