Hindi Poetry | मैं डर जाता हूं जब....
यकीन मानिए,
मुझे नहीं पता डर क्या होता है
लेकिन यह भी नहीं कि मैं डरता नहीं
मैं डर जाता हूं जब कान तक पहुंचती है पिताजी की आवाज
'अब थकने लगा हूं मैं' क्योंकि उन्हें देखा है
कभी न थकने के अंदाज में
डर जाता हूं, जब हमेशा 'छोटे ठाकुर' के भोग का इंतजाम करने वाली मां कहती है
कहीं भगवान है भी या नहीं, है तो सुनता क्यों नही?
डरता हूं जब हमउम्र साथी करने लगते हैं
बीमा पॉलिसियों और मेडिकल कवर की बात
कहते हैं-' तूने तो बहुत कम 'कवर' लिया है
तब तो और भी डर जाता हूं
जब सामने बड़ा हुआ छोटू किसी से कहता है
'जिंदगी का तो नतीजा ही सिफर है, दोस्त'
और तब तो बुरी तरह डर जाता हूं जब
चौथी में पढ़ रहा बेटा
हिन्दी में वाक्य बनाकर पूछता है
पापा, इसका फ्यूचर टेंस क्या होगा?
मुझे नहीं पता डर क्या होता है
लेकिन यह भी नहीं कि मैं डरता नहीं
मैं डर जाता हूं जब कान तक पहुंचती है पिताजी की आवाज
'अब थकने लगा हूं मैं' क्योंकि उन्हें देखा है
कभी न थकने के अंदाज में
डर जाता हूं, जब हमेशा 'छोटे ठाकुर' के भोग का इंतजाम करने वाली मां कहती है
कहीं भगवान है भी या नहीं, है तो सुनता क्यों नही?
डरता हूं जब हमउम्र साथी करने लगते हैं
बीमा पॉलिसियों और मेडिकल कवर की बात
कहते हैं-' तूने तो बहुत कम 'कवर' लिया है
तब तो और भी डर जाता हूं
जब सामने बड़ा हुआ छोटू किसी से कहता है
'जिंदगी का तो नतीजा ही सिफर है, दोस्त'
और तब तो बुरी तरह डर जाता हूं जब
चौथी में पढ़ रहा बेटा
हिन्दी में वाक्य बनाकर पूछता है
पापा, इसका फ्यूचर टेंस क्या होगा?
