Poem | मेरे प्रिय मेरे बापू
रेखा भाटिया
मेरे शब्द तो उनके प्रति मेरे भाव हैं,उदगार हैं
परन्तु उनके शब्द तो बाण हैं,हथियार हैं,
सच और शब्दों को साथ लिए,
जनसमूह के साथ जब वो मोर्चे पर निकल पड़े,
तब सारे हथियार झुक गए,सारे बंधन टूट गए,
ढाई सेर का उनका शरीर था,
परन्तु ढाई मन का उनका हौंसला,
तन पर खादी की इक चादर ओड़े जीवन बिता दिया,
अंग्रेजों के रेशमी कपड़ों की होली जला,
देश को आजाद करा दिया,
हमें हमारा मान लौटाया,सम्मान लौटाया।
जब कभी कोई बुरा कर्म करता हूँ,
तब मेरे मन का गाँधी भीतर कहीं छटपटा उठता है,
जब कभी अच्छा कर्म करूँ,
तब मेरे मन का गाँधी मुझे शाबाशी देता है,
यही आशा है मेरी, तेरा मार्गदर्शन पाकर,
सच की राह पर चलता चलूँ,
आजाद भारत में आजादी से,
जीवन विचरण करता रहूँ।
ND
परन्तु उनके शब्द तो बाण हैं,हथियार हैं,
सच और शब्दों को साथ लिए,
जनसमूह के साथ जब वो मोर्चे पर निकल पड़े,
तब सारे हथियार झुक गए,सारे बंधन टूट गए,
ढाई सेर का उनका शरीर था,
परन्तु ढाई मन का उनका हौंसला,
तन पर खादी की इक चादर ओड़े जीवन बिता दिया,
अंग्रेजों के रेशमी कपड़ों की होली जला,
देश को आजाद करा दिया,
हमें हमारा मान लौटाया,सम्मान लौटाया।
जब कभी कोई बुरा कर्म करता हूँ,
तब मेरे मन का गाँधी भीतर कहीं छटपटा उठता है,
जब कभी अच्छा कर्म करूँ,
तब मेरे मन का गाँधी मुझे शाबाशी देता है,
यही आशा है मेरी, तेरा मार्गदर्शन पाकर,
सच की राह पर चलता चलूँ,
आजाद भारत में आजादी से,
जीवन विचरण करता रहूँ।
