शुक्रवार, 2 जनवरी 2026
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Written By स्मृति आदित्य

मेरे नेह-वसंत

काव्य-संसार

मेरे नेह वसंत
ND
वसंत ने दस्तक दी है
तुम्हारे बिना
ठीक वैसे ही जैसे
तुमने दस्तक दी थी अचानक
मेरे द्वार
वसंत के बिना
तुमने चूमा था जिसे
माथे की
उस हल्की-सी सिलवट की कसम
मेरी मन-बगिया के नेह-वसंत
बस तुम हो,
तुम, सागर अनंत।