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Poem | मुझे तुमसे डर लगता है

डर
फाल्गुन
NDND
इस विषैले धूएँ से सराबोर
अजनबी दुनिया में तुम
खुले आकाश की ठंडी हवा हो
मैं जानती हूँ,
मगर फिर भी न जाने क्यों
आजकल मुझे तुमसे डर लगता है।

मैं जानती हूँ कि
तुम विश्वास का श्वेत उजियारा हो
मगर इन दिनों अविश्वास के
भयावह झंझावात में खड़ी अकेली
मुझे तुमसे डर लगता है।

दर्द की ना जाने कितनी लहरें
मेरे मन के महासिंधु में
उमड़-घुमड़ कर ठहर जाती है
मैं रोज इनमें से बटोर लाती हूँ
आशा के दमकते मोती,
मेरे दोस्त, मैं जानती हूँ
ये मोती तुम हो
मगर फिर भी समाज के
तड़ातड़ पड़ते
थपेड़ों को सहती
आजकल मुझे तुमसे डर लगता है।